दो दशक से ज्यादा पुराने भ्रष्टाचार मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया है। रेलवे सुरक्षा बल के एक पूर्व अधिकारी को रिश्वत के सभी आरोपों से बरी कर दिया गया है। अदालत ने जांच के तरीके में गंभीर खामियों और जल्दबाजी का जिक्र किया। लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस मामले में अधिकारी को पहले दोषी ठहराया गया था, उसमें अब सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन के सबूतों पर ही सवाल खड़े कर दिए? आइए जानते हैं पूरा मामला।
यह मामला रेलवे सुरक्षा बल यानी RPF के पूर्व मंडल सुरक्षा आयुक्त से जुड़ा है। आरोप था कि अधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए स्थानांतरण, तैनाती और दूसरी सेवा-संबंधी सुविधाएं चाहने वाले RPF कर्मियों से कथित तौर पर रिश्वत मांगी और हासिल की। अभियोजन के अनुसार, इस कथित लेन-देन में अधीनस्थ अधिकारियों को बिचौलियों के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
जांच के बाद सीबीआई ने कथित तौर पर अलग-अलग रिश्वत लेन-देन के आधार पर कई अभियोजन मामले दर्ज किए। विशेष अदालत ने अधिकारी को दोषी ठहराया और सजा सुनाई। इसके बाद केरल उच्च न्यायालय ने मई 2024 में दिए गए आदेशों के जरिए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। अधिकारी ने इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने की। पीठ ने जांच एजेंसी की ट्रैप कार्रवाई के तरीके और बरामद रकम से जुड़े सबूतों पर विचार किया। अदालत के सामने अहम सवाल यह था कि क्या अभियोजन यह साबित कर पाया कि बरामद कथित रिश्वत की रकम वास्तव में अपीलकर्ता अधिकारी के लिए ही थी।
फैसले में अदालत ने ट्रैप कार्रवाई के समय और प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए। शिकायतकर्ता ने कथित रिश्वत मांगने की जानकारी 3 अगस्त 2005 को सीबीआई को दी थी। इसके अगले ही दिन, यानी 4 अगस्त को प्राथमिकी दर्ज की गई और उसी दिन ट्रैप कार्रवाई भी की गई।
पीठ ने इस तेजी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि औपचारिक प्राथमिकी दर्ज होने से पहले ही शिकायत का सत्यापन करके संज्ञेय अपराध की जांच शुरू किए जाने की बात सामने आई। अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि ट्रैप से कुछ ही समय पहले दो स्वतंत्र गवाहों की व्यवस्था की गई थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि जांच एजेंसी को तेजी से कार्रवाई करने के लिए दोषी ठहराया जाना चाहिए। लेकिन पीठ के मुताबिक, कार्रवाई के तरीके में कुछ ऐसे पहलू थे, जिनसे संदेह पैदा हुआ। अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने अधिकारी की ओर से उठाए गए संदेहों को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा।
पीठ ने माना कि जांच और अभियोजन से जुड़ी खामियां मामले पर उचित संदेह पैदा करती हैं। खास तौर पर, सीबीआई यह साबित करने में विफल रही कि बरामद रकम अपीलकर्ता अधिकारी के लिए ही थी। अदालत ने इसी आधार पर दोनों अपील स्वीकार करते हुए अधिकारी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
इस फैसले का मतलब यह है कि इस मामले में अभियोजन आरोपों को आवश्यक स्तर तक साबित नहीं कर सका। यह किसी भी भ्रष्टाचार के आरोप पर सामान्य टिप्पणी नहीं, बल्कि इस विशेष मामले में उपलब्ध सबूतों और जांच की प्रक्रिया पर अदालत का निष्कर्ष है।
करीब दो दशक पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला जांच प्रक्रिया, सबूतों की विश्वसनीयता और आपराधिक मुकदमे में संदेह के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपों को साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन की होती है, और जब सबूतों में ऐसी खामियां हों जो उचित संदेह पैदा करें, तो दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती।


