संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और भारत को स्थायी सदस्य बनाए जाने की मांग एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा में है। रूस ने सुरक्षा परिषद के विस्तार का समर्थन किया है और कहा है कि स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। रूस ने यह भी स्पष्ट किया है कि मौजूदा वीटो व्यवस्था को बनाए रखना जरूरी है।
रूस का यह रुख भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भारत लगातार कहता रहा है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार जरूरी है। भारत चाहता है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और महत्वपूर्ण देशों को वैश्विक निर्णय लेने वाली इस संस्था में उचित प्रतिनिधित्व मिले।
वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। इन पांचों देशों के पास वीटो पावर है। इसके अलावा सुरक्षा परिषद में दस अस्थायी सदस्य भी होते हैं, जिनका कार्यकाल सीमित होता है।
भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है। भारत का तर्क है कि दुनिया की आबादी, अर्थव्यवस्था, शांति अभियानों में योगदान और वैश्विक मामलों में उसकी भूमिका को देखते हुए उसे सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए।
रूस ने सुरक्षा परिषद के विस्तार का समर्थन करते हुए कहा है कि स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है। रूस के मुताबिक, स्थायी सदस्यता की व्यवस्था और वीटो का अधिकार संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा संरचना के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। यानी रूस सुरक्षा परिषद का विस्तार करने के पक्ष में है, लेकिन मौजूदा वीटो व्यवस्था को खत्म करने के पक्ष में नहीं है।
भारत की स्थायी सदस्यता को लेकर पहले भी कई देशों ने समर्थन जताया है। भारत की दावेदारी को लेकर जापान, जर्मनी और ब्राजील जैसे देशों के साथ G4 समूह के स्तर पर भी लंबे समय से चर्चा होती रही है। भारत का कहना है कि सुरक्षा परिषद की संरचना 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप होनी चाहिए।
हालांकि स्थायी सदस्यता और वीटो पावर दो अलग-अलग मुद्दे हैं। अगर भविष्य में सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है, तो नए स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार मिलेगा या नहीं, यह अपने आप तय नहीं होता। इस पर संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच अलग से सहमति की जरूरत होगी।
सुरक्षा परिषद में बदलाव के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन की आवश्यकता होती है। इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति जरूरी है और मौजूदा स्थायी सदस्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए भारत की स्थायी सदस्यता का सवाल सिर्फ किसी एक देश के समर्थन से तय नहीं हो सकता।
चीन भी सुरक्षा परिषद का मौजूदा स्थायी सदस्य है और उसके पास वीटो पावर है। इसलिए सुरक्षा परिषद के विस्तार पर चीन का रुख भी महत्वपूर्ण होगा। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस सहित अन्य स्थायी सदस्यों की स्थिति भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करेगी।
रूस और भारत के बीच लंबे समय से रणनीतिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों ने रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में सहयोग किया है। संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भी दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर सहयोग देखने को मिलता रहा है।
हालांकि रूस के मौजूदा बयान को सीधे तौर पर भारत को वीटो पावर देने के अंतिम फैसले के रूप में देखना सही नहीं होगा। रूस ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने और मौजूदा वीटो व्यवस्था को बनाए रखने का समर्थन किया है। भारत को स्थायी सदस्य बनाने और उसे वीटो अधिकार मिलने का अंतिम निर्णय व्यापक अंतरराष्ट्रीय बातचीत और संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
अब सवाल यह है कि सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या भारत को भविष्य में स्थायी सदस्यता मिलती है। फिलहाल रूस के समर्थन से भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग को लेकर अंतरराष्ट्रीय बहस एक बार फिर तेज हुई है।


