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ईरान से जंग खत्म होते ही धड़ाम होंगे Oil Prices? ट्रंप के बड़े संकेत, दुनिया की नजर अब इस फैसले पर

ईरान के साथ चल रहे युद्ध को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा दावा किया है, जिसने दुनिया के ऊर्जा बाजार की निगाहें एक बार फिर ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष पर टिका दी हैं। ट्रंप का कहना है कि यह युद्ध बहुत जल्द किसी न किसी नतीजे पर पहुंच सकता है और जैसे ही संघर्ष खत्म होगा, तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिल सकती है। उनके इस बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या युद्ध रुकते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें वास्तव में तेजी से नीचे आएंगी?

टेक्सास पहुंचने के बाद पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने ईरान की आर्थिक और सैन्य स्थिति को बेहद कमजोर बताया। उन्होंने दावा किया कि ईरान में महंगाई 301 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और देश के पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं हैं। ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान की मुद्रा और उसकी सैन्य क्षमता पर संघर्ष का भारी असर पड़ा है। हालांकि, ये आंकड़े और ट्रंप द्वारा किए गए सैन्य दावे उनके अपने बयान के तौर पर सामने आए हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्यों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि ईरान के साथ युद्ध किसी न किसी तरीके से बहुत जल्दी खत्म हो जाएगा। उनका कहना है कि ईरान के सामने अब यह तय करने का विकल्प है कि वह इस संघर्ष को किस तरह समाप्त करना चाहता है। ट्रंप के मुताबिक, युद्ध खत्म होने के बाद तेल की कीमतों पर सबसे बड़ा असर दिखाई देगा और कीमतें बहुत तेजी से नीचे जा सकती हैं। इससे दुनिया के उन देशों को राहत मिलने की उम्मीद बन सकती है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदते हैं।

तेल की कीमतों पर ईरान युद्ध का असर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्य पूर्व दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा क्षेत्रों में शामिल है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाला तेल परिवहन वैश्विक बाजार के लिए बेहद अहम है। हाल के दिनों में इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने के कारण कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बाजार में चिंता बनी हुई है। 1 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड की कीमत 102 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर और अमेरिकी WTI करीब 93 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था, हालांकि 2 अक्टूबर को तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई।

अगर अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी समझौता होता है और समुद्री मार्गों पर तनाव कम होता है, तो बाजार में सप्लाई को लेकर बनी चिंता घट सकती है। यही वजह है कि युद्ध खत्म होने की किसी भी ठोस खबर का असर कच्चे तेल की कीमतों पर तुरंत दिखाई दे सकता है। लेकिन केवल युद्ध खत्म होने की घोषणा से कीमतों में कितनी गिरावट होगी, यह कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करेगा। वैश्विक मांग, तेल उत्पादन, समुद्री परिवहन, प्रतिबंध और दूसरे देशों की आपूर्ति नीतियां भी कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की कोशिशें भी जारी हैं। ईरान की ओर से युद्ध समाप्त करने का प्रस्ताव सामने आया था और अमेरिकी प्रतिक्रिया भी ईरान तक पहुंच चुकी है, लेकिन बातचीत की शर्तों और अंतिम समझौते को लेकर अभी स्पष्टता नहीं है। दूसरी तरफ तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और अमेरिकी प्रशासन की ओर से सैन्य विकल्पों पर भी बयान सामने आते रहे हैं।

डोनाल्ड ट्रंप ने एक और महत्वपूर्ण बात दोहराई है कि ईरान के पास कभी भी परमाणु हथियार नहीं होंगे। यानी युद्ध समाप्त करने की संभावित कोशिशों के साथ परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा भी बातचीत के केंद्र में बना हुआ है। ईरान के लिए प्रतिबंधों में राहत, आर्थिक दबाव और तेल निर्यात से जुड़े मुद्दे अहम हैं, जबकि अमेरिका परमाणु हथियारों और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अपनी शर्तों पर जोर दे रहा है।

भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट से आयात लागत पर दबाव कम हो सकता है, हालांकि घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर इसका असर तुरंत और उसी अनुपात में दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। रुपये की स्थिति, टैक्स, रिफाइनिंग लागत और घरेलू ईंधन मूल्य निर्धारण जैसे कई दूसरे कारक भी इसमें भूमिका निभाते हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए वैश्विक तेल बाजार में बड़ा बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

फिलहाल ट्रंप का बयान एक संकेत जरूर देता है, लेकिन युद्ध कब और किस शर्त पर खत्म होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। अगर वास्तव में अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होता है, क्षेत्रीय तनाव कम होता है और तेल की सप्लाई सामान्य होती है, तो कच्चे तेल की कीमतों पर नीचे की ओर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन जब तक युद्ध समाप्ति और सप्लाई व्यवस्था को लेकर ठोस स्थिति सामने नहीं आती, तब तक तेल बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना बनी रहेगी।

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