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Mental Health बिगाड़ रही देर रात Reels देखने की आदत! Alarm के लिए Phone से बनाएं दूरी, अपनाएं ये तरीके

रात को बिस्तर पर लेटते ही फोन चलाने की आदत कहीं आपकी मानसिक सेहत पर भारी तो नहीं पड़ रही? दिनभर की थकान के बाद कई लोग कुछ मिनट आराम करने या मनोरंजन के लिए सोशल मीडिया खोलते हैं, लेकिन रील्स देखते-देखते कब घंटों बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता। लगातार नकारात्मक खबरें, परेशान करने वाले वीडियो और सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करने की यह आदत आपकी नींद और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। इसे डूमस्क्रॉलिंग कहा जाता है। अगर आप भी रात में फोन चलाते-चलाते देर से सोते हैं, तो कुछ आसान बदलाव इस आदत को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास दिनभर अपने लिए बहुत कम समय होता है। ऐसे में रात को सोने से पहले मोबाइल फोन चलाना एक आम आदत बन गई है। कोई सोशल मीडिया पर खबरें देखता है, तो कोई मनोरंजन के लिए रील्स और छोटे वीडियो देखता रहता है। शुरुआत में यह आदत सामान्य लग सकती है, लेकिन जब फोन इस्तेमाल करने का समय लगातार बढ़ने लगे और नींद प्रभावित होने लगे, तो इस पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है।

डूमस्क्रॉलिंग का मतलब है इंटरनेट या सोशल मीडिया पर लगातार ऐसी खबरें, वीडियो या जानकारियां देखते रहना, जिनमें अक्सर नकारात्मक, डर पैदा करने वाली या परेशान करने वाली सामग्री शामिल होती है। कई बार व्यक्ति जानता है कि लगातार ऐसी सामग्री देखने से उसका मन खराब हो रहा है, फिर भी वह फोन नीचे नहीं रख पाता। इससे तनाव बढ़ सकता है और मन बेचैन रह सकता है।

देर रात तक फोन चलाने का एक बड़ा नुकसान नींद की दिनचर्या पर पड़ सकता है। वीडियो देखते रहने से सोने का समय टल जाता है और पर्याप्त नींद लेने का मौका कम हो सकता है। स्क्रीन की रोशनी और लगातार मिलने वाली सूचनाएं भी सोने से पहले आराम करने में बाधा डाल सकती हैं। यदि यह आदत लंबे समय तक बनी रहे, तो दिन में थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी महसूस हो सकती है। हालांकि, हर व्यक्ति पर इसका असर अलग-अलग हो सकता है।

इस आदत को कम करने के लिए सबसे पहले रात में फोन इस्तेमाल करने की एक समय सीमा तय करें। उदाहरण के लिए, सोने से 30 से 60 मिनट पहले सोशल मीडिया बंद कर दें। शुरुआत में यह मुश्किल लग सकता है, इसलिए धीरे-धीरे फोन इस्तेमाल करने का समय कम करें। फोन में ऐप टाइमर या डिजिटल वेलबीइंग जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करके सोशल मीडिया पर बिताए जाने वाले समय को सीमित किया जा सकता है।

एक अन्य उपयोगी तरीका है फोन में ग्रेस्केल मोड चालू करना। इस सुविधा से स्क्रीन के रंग हटकर तस्वीरें और वीडियो काले-सफेद दिखाई देने लगते हैं। इससे कुछ लोगों के लिए सोशल मीडिया कम आकर्षक हो सकता है और फोन चलाने की इच्छा घटाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, यह तरीका हर व्यक्ति के लिए समान रूप से प्रभावी नहीं होता।

अगर आप सुबह उठने के लिए मोबाइल में अलार्म लगाते हैं और इसी वजह से फोन को बिस्तर के पास रखते हैं, तो साधारण अलार्म घड़ी का इस्तेमाल करने पर विचार करें। इससे मोबाइल को बिस्तर से दूर रखना आसान हो सकता है। फोन को कमरे के दूसरे हिस्से में या सोने की जगह से दूर चार्ज करें। इससे हर कुछ मिनट में स्क्रीन देखने की आदत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

रात को सोने से पहले सोशल मीडिया देखने के बजाय कोई किताब पढ़ें, हल्का संगीत सुनें या कुछ मिनट गहरी सांस लेने का अभ्यास करें। अगले दिन के जरूरी कामों की सूची बनाना भी उपयोगी हो सकता है, ताकि बिस्तर पर लेटकर बार-बार फोन देखने की जरूरत कम महसूस हो। सोने और जागने का समय नियमित रखने से भी बेहतर नींद की दिनचर्या बनाने में मदद मिलती है।

इसके अलावा, सोशल मीडिया पर आने वाली गैरजरूरी सूचनाओं को बंद करें और नकारात्मक सामग्री दिखाने वाले खातों को म्यूट या अनफॉलो करने पर विचार करें। यदि आप किसी खबर को लेकर परेशान हैं, तो बार-बार वही खबर देखने के बजाय विश्वसनीय स्रोत से जानकारी लेकर फोन रख दें।

अगर लगातार तनाव, बेचैनी या नींद की परेशानी बनी रहती है और इसका असर रोजमर्रा के जीवन पर पड़ने लगता है, तो किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर रहेगा।

कुल मिलाकर, रात में रील्स और नकारात्मक सामग्री देखते रहने की आदत को बदलने के लिए बड़े बदलावों की जरूरत नहीं है। सोने से पहले फोन से दूरी बनाना, ग्रेस्केल मोड का इस्तेमाल करना और अलार्म के लिए साधारण घड़ी अपनाना छोटे लेकिन उपयोगी कदम हो सकते हैं। याद रखें, मोबाइल का इस्तेमाल आपकी जरूरत के लिए होना चाहिए, न कि उसकी वजह से आपकी नींद और मानसिक सुकून प्रभावित हों।

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