मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू एक बार फिर दक्षिण एशिया की राजनीति को लेकर चर्चा में हैं। भारत के साथ संबंधों में तनाव के दौर से गुजर चुके मुइज्जू अब पाकिस्तान के साथ सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में उनकी यात्रा के दौरान रक्षा, समुद्री सुरक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित कई क्षेत्रों में 20 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए। इस घटनाक्रम ने क्षेत्रीय कूटनीति को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर मालदीव और पाकिस्तान के बीच अचानक इतनी नजदीकी क्यों बढ़ रही है? और दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क की चर्चा के पीछे क्या रणनीति हो सकती है?
मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के निमंत्रण पर तीन दिवसीय यात्रा के लिए इस्लामाबाद पहुंचे थे। इस यात्रा को दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने और विभिन्न क्षेत्रों में साझेदारी को मजबूत करने पर चर्चा हुई। इसके बाद दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने 20 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए।
इन समझौतों में रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा कई देशों के लिए अहम मुद्दा है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, अवैध गतिविधियों पर रोक और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषय मालदीव तथा पाकिस्तान दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि, समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने का अर्थ यह नहीं है कि सभी योजनाएं तत्काल लागू हो गई हैं। उनके वास्तविक प्रभाव का आकलन उनके क्रियान्वयन के बाद ही किया जा सकेगा।
सूचना प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में सहयोग भी इस यात्रा का एक अहम हिस्सा रहा। डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है और देश प्रशासन, सुरक्षा तथा आर्थिक विकास में नई तकनीकों की भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में मालदीव और पाकिस्तान के बीच तकनीकी सहयोग दोनों देशों के लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन इन समझौतों के अंतर्गत कौन-सी परियोजनाएं शुरू होंगी, यह आगे की आधिकारिक घोषणाओं से स्पष्ट होगा।
इस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पहलू दोनों देशों के राजनयिक संबंधों की वर्षगांठ है। मालदीव और पाकिस्तान के बीच राजनयिक संबंध 1966 में स्थापित हुए थे। वर्ष 2026 में इन संबंधों के 60 वर्ष पूरे होने का अवसर दोनों देशों के लिए अपनी साझेदारी को प्रदर्शित करने का मौका है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, मुइज्जू की यह यात्रा लगभग 11 वर्षों बाद किसी मालदीव के राष्ट्रपति की पाकिस्तान यात्रा है। इस लिहाज से भी इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अब सवाल उठता है कि इस घटनाक्रम का भारत पर क्या असर पड़ सकता है। मालदीव हिंद महासागर में भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश है। दोनों देशों के बीच भौगोलिक निकटता, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, पर्यटन और विकास सहयोग के पुराने संबंध हैं। हालांकि, राष्ट्रपति मुइज्जू के कार्यकाल की शुरुआत में भारत-मालदीव संबंधों में तनाव देखने को मिला था। उनकी सरकार के दौरान भारतीय सैन्य कर्मियों की मालदीव से वापसी का मुद्दा भी चर्चा में रहा। इसके बाद दोनों देशों ने संबंधों को स्थिर करने और सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए।
मुइज्जू का पाकिस्तान के साथ सहयोग बढ़ाना अपने आप में भारत के खिलाफ किसी गठबंधन का प्रमाण नहीं है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में देश अक्सर अपनी आर्थिक, सुरक्षा और कूटनीतिक जरूरतों के अनुसार कई देशों के साथ साझेदारी करते हैं। इसलिए इस यात्रा का मूल्यांकन केवल भारत-विरोधी राजनीति के नजरिए से करना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक स्थिति समझने के लिए समझौतों की प्रकृति, उनके क्रियान्वयन और दोनों देशों के भविष्य के फैसलों पर नजर रखना जरूरी है।
जहां तक सार्क की बात है, दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन की स्थापना 1985 में हुई थी। इसके सदस्य देशों में भारत, पाकिस्तान, मालदीव, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और अफगानिस्तान शामिल हैं। वर्ष 2014 में काठमांडू में आयोजित सार्क शिखर सम्मेलन के बाद अब तक कोई नया शिखर सम्मेलन नहीं हुआ है। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव तथा क्षेत्रीय राजनीतिक मतभेदों ने संगठन की गतिविधियों को प्रभावित किया है।
सार्क को दोबारा सक्रिय करने की मांग दक्षिण एशियाई देशों के बीच व्यापार, संपर्क, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक सहयोग बढ़ाने के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन केवल सार्क का उल्लेख करने से संगठन की गतिविधियां तुरंत शुरू नहीं हो जाएंगी। इसके लिए सदस्य देशों के बीच सहमति और राजनीतिक स्तर पर ठोस पहल आवश्यक होगी।
कुल मिलाकर, मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा और 20 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर दक्षिण एशिया की बदलती कूटनीतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अब सबसे अहम सवाल यह होगा कि इन समझौतों को कितनी तेजी से लागू किया जाता है और क्या क्षेत्रीय सहयोग के लिए सार्क जैसे मंच को दोबारा सक्रिय करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठता है। फिलहाल, इन घटनाक्रमों के आधार पर किसी बड़े रणनीतिक बदलाव का निष्कर्ष निकालने से पहले आगे की आधिकारिक घोषणाओं पर नजर रखना जरूरी है।


