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Health Tips: Hepatitis B और C के साइलेंट लक्षणों को न करें नजरअंदाज, लिवर डैमेज और सिरोसिस का बढ़ सकता है खतरा

लिवर हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है। यह पाचन में मदद करने, पोषक तत्वों को संसाधित करने, शरीर से हानिकारक पदार्थों को हटाने और कई जरूरी कार्यों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन जब यही लिवर किसी संक्रमण की चपेट में आ जाता है, तो इसका असर धीरे-धीरे पूरी सेहत पर पड़ सकता है। खास चिंता की बात यह है कि हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी जैसे वायरल संक्रमण लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के शरीर में मौजूद रह सकते हैं। ऐसे में व्यक्ति को बीमारी का पता तब चलता है, जब लिवर को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है।

आजकल खान-पान, जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही को लेकर काफी चर्चा होती है, लेकिन हेपेटाइटिस बी और सी को केवल खराब खान-पान से जोड़ना सही नहीं है। ये दोनों संक्रमण मुख्य रूप से वायरस के कारण होते हैं। हेपेटाइटिस बी संक्रमित रक्त और कुछ शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क से फैल सकता है। वहीं, हेपेटाइटिस सी मुख्य रूप से संक्रमित रक्त के संपर्क से फैलता है। दूषित भोजन और पानी से होने वाला हेपेटाइटिस आमतौर पर ए और ई वायरस से संबंधित होता है। इसलिए संक्रमण के प्रकार और उसके फैलने के तरीके को समझना बेहद जरूरी है।

हेपेटाइटिस बी और सी का सबसे बड़ा खतरा इनके शुरुआती लक्षणों का स्पष्ट न होना है। कई संक्रमित लोगों को लंबे समय तक थकान, कमजोरी या किसी अन्य परेशानी का अनुभव नहीं होता। कुछ लोगों में संक्रमण होने के बावजूद कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते। इसी वजह से वे जांच नहीं कराते और उन्हें बीमारी के बारे में जानकारी नहीं मिल पाती। हालांकि, लक्षणों का न होना इस बात की गारंटी नहीं है कि लिवर पूरी तरह स्वस्थ है। संक्रमण लंबे समय तक बना रहने पर लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है।

इन संक्रमणों के कुछ संभावित लक्षणों में लगातार थकान रहना, भूख कम लगना, जी मिचलाना, उल्टी होना, पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द या असहजता महसूस होना और कमजोरी शामिल हैं। कुछ मामलों में त्वचा और आंखों का सफेद हिस्सा पीला पड़ सकता है। पेशाब का रंग गहरा होना और मल का रंग सामान्य से हल्का होना भी लिवर से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है। हालांकि, ये लक्षण केवल हेपेटाइटिस में ही नहीं, बल्कि अन्य बीमारियों में भी दिखाई दे सकते हैं। इसलिए इनके आधार पर खुद से बीमारी का निष्कर्ष निकालने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

यदि हेपेटाइटिस बी या सी का संक्रमण लंबे समय तक बना रहता है, तो लिवर में सूजन और धीरे-धीरे घाव जैसे बदलाव विकसित हो सकते हैं। इस स्थिति में लिवर के ऊतकों पर निशान बनने लगते हैं, जिसे फाइब्रोसिस कहा जाता है। गंभीर अवस्था में यही समस्या सिरोसिस का रूप ले सकती है। सिरोसिस में लिवर की सामान्य संरचना और कार्यक्षमता प्रभावित हो जाती है। कुछ मरीजों में लंबे समय तक संक्रमण रहने से लिवर कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है। हालांकि, हर संक्रमित व्यक्ति में ये जटिलताएं विकसित हों, ऐसा जरूरी नहीं है। समय पर जांच और उचित इलाज से जोखिम को कम किया जा सकता है।

हेपेटाइटिस से बचाव के लिए कुछ सावधानियां अपनाना जरूरी है। हेपेटाइटिस बी से बचाव के लिए टीका उपलब्ध है, इसलिए टीकाकरण की स्थिति के बारे में चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए। हेपेटाइटिस सी से बचाव के लिए फिलहाल कोई टीका उपलब्ध नहीं है, लेकिन आधुनिक दवाओं से इसका इलाज करके अधिकांश मरीजों को ठीक किया जा सकता है। इसके अलावा, हमेशा जांचे हुए रक्त का इस्तेमाल, सुई और सिरिंज साझा न करना तथा टैटू या शरीर में छेद करवाते समय साफ और सुरक्षित उपकरणों का इस्तेमाल करना महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत इस्तेमाल की ऐसी वस्तुएं, जिन पर रक्त लगा हो सकता है, दूसरों के साथ साझा करने से भी बचना चाहिए।

यदि किसी व्यक्ति को हेपेटाइटिस का खतरा रहा है या उसे लगातार थकान, पीलिया अथवा पेट में असहजता जैसी समस्या हो रही है, तो चिकित्सक की सलाह से जांच करानी चाहिए। हेपेटाइटिस बी और सी की पहचान के लिए रक्त परीक्षण किए जाते हैं। केवल लक्षणों के आधार पर संक्रमण की पुष्टि नहीं की जा सकती। जांच में संक्रमण की पुष्टि होने पर डॉक्टर लिवर की स्थिति का आकलन करके उचित उपचार तय कर सकते हैं।

स्वास्थ्य के मामले में सबसे बड़ी गलती यह है कि लक्षण दिखाई देने का इंतजार किया जाए। हेपेटाइटिस बी और सी लंबे समय तक बिना स्पष्ट संकेतों के मौजूद रह सकते हैं, इसलिए जोखिम होने पर समय पर जांच कराना बेहद महत्वपूर्ण है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली समग्र स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं, लेकिन ये वायरल हेपेटाइटिस की जांच, टीकाकरण या उपचार का विकल्प नहीं हैं। सही जानकारी, समय पर जांच और चिकित्सकीय देखभाल से लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका कम की जा सकती है।

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