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नई दिल्ली में BRICS संसदीय मंच ने उठाई ग्लोबल साउथ की आवाज, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की मांग

नई दिल्ली में 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का समापन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा। दो दिवसीय सम्मेलन के अंत में सदस्य देशों के संसदीय प्रतिनिधियों ने संयुक्त घोषणापत्र जारी कर वैश्विक शासन व्यवस्था में व्यापक बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया। घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में सुधार, विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने तथा अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को मजबूत करने जैसे अहम मुद्दे शामिल रहे। इस मंच के माध्यम से सदस्य देशों ने स्पष्ट संदेश दिया कि वैश्विक फैसलों में ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की आवाज को अधिक महत्व मिलना चाहिए।

इस संसदीय मंच का मुख्य विषय था, जन-केंद्रित विकास के लिए संसदों को बढ़ावा देना। सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों ने इस बात पर चर्चा की कि संसदें अपने नागरिकों की जरूरतों को पूरा करने, विकास को गति देने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने में किस तरह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के बीच विभिन्न वैश्विक चुनौतियों और उनके संभावित समाधानों पर विचार-विमर्श हुआ।

इस बैठक में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात के संसदीय प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। विभिन्न देशों के विधायी नेताओं की भागीदारी ने इस मंच को अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संसदीय संवाद के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया। प्रतिनिधियों ने अपने विचार साझा करते हुए वैश्विक संस्थाओं को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाने की जरूरत पर जोर दिया।

संयुक्त घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की मांग प्रमुखता से उठाई गई। सदस्य देशों का मानना है कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप अधिक न्यायपूर्ण, समान, लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिमूलक बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही संस्थाओं की कार्यक्षमता और निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया।

ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व का मुद्दा इस सम्मेलन के केंद्र में रहा। विकासशील देशों का लंबे समय से यह कहना रहा है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उनकी जनसंख्या, आर्थिक महत्व और वैश्विक चुनौतियों में उनकी भूमिका के अनुरूप प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होना चाहिए। ब्रिक्स संसदीय मंच में भी इस विषय को महत्व दिया गया। प्रतिनिधियों ने कहा कि वैश्विक शासन व्यवस्था में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय निर्णय अधिक संतुलित और व्यापक हितों को ध्यान में रखकर लिए जा सकेंगे।

घोषणापत्र में नई दिल्ली घोषणा-पत्र के प्रति प्रतिबद्धता दोहराते हुए उसके अनुच्छेद 13 का भी उल्लेख किया गया। इसका उद्देश्य वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज को बेहतर तरीके से शामिल करने की आवश्यकता पर ध्यान दिलाना था। इस मांग को संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा संरचना में सुधार की व्यापक बहस से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, सुरक्षा परिषद में किसी भी वास्तविक बदलाव के लिए सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति और निर्धारित अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं की आवश्यकता होगी।

सम्मेलन में आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति दोहराने पर भी जोर दिया गया। प्रतिनिधियों ने आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती मानते हुए उसके सभी स्वरूपों से निपटने के लिए सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। इस विषय पर सदस्य देशों के बीच सूचना साझा करने, समन्वय बढ़ाने और आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण बने रहे।

इसके अलावा, एकतरफा प्रतिबंधों को लेकर भी घोषणापत्र में चिंता जताई गई। प्रतिनिधियों ने ऐसे प्रतिबंधों की निंदा करते हुए अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सहयोग और संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया। यह मुद्दा वैश्विक राजनीति में लंबे समय से बहस का विषय रहा है, क्योंकि अलग-अलग देश एकतरफा प्रतिबंधों के कानूनी, आर्थिक और मानवीय प्रभावों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं।

पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी चर्चा हुई और क्षेत्र में शांति स्थापित करने के प्रयासों का समर्थन किया गया। प्रतिनिधियों ने क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व को रेखांकित किया। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और संघर्षों के बीच शांति की अपील को वैश्विक स्थिरता के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कुल मिलाकर, नई दिल्ली में आयोजित 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के संयुक्त घोषणापत्र ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार, ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व, आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय शांति जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। अब इन प्रस्तावों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सदस्य देश इन्हें आगे बढ़ाने के लिए किस तरह सहयोग करते हैं और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की दिशा में कितनी प्रगति होती है।

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