बांग्लादेश में एक बार फिर भारत विरोधी नारों की गूंज सुनाई देने लगी है। राजधानी ढाका की सड़कों पर हजारों लोगों की भीड़ जुटी और देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन ने राजनीतिक रंग ले लिया। शुरुआत महंगाई, बिजली संकट, गैस की किल्लत और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ हुई, लेकिन इस रैली में भारत का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। प्रदर्शनकारियों ने ‘दिल्ली ना ढाका’ के नारे लगाए, जिसके जवाब में भीड़ ने ‘ढाका-ढाका’ के नारे दोहराए। इस पूरे घटनाक्रम ने भारत और बांग्लादेश के बीच पहले से तनावपूर्ण संबंधों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज कर दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश की घरेलू राजनीतिक लड़ाई में भारत का मुद्दा फिर से इस्तेमाल किया जा रहा है? दरअसल, शुक्रवार 30 अक्टूबर को बांग्लादेश की नेशनल सिटिजन पार्टी यानी एनसीपी ने राजधानी ढाका के शाहबाग इलाके में राष्ट्रीय संग्रहालय के सामने एक बड़ी विरोध रैली आयोजित की। इस रैली का नेतृत्व पार्टी के संयोजक नाहिद इस्लाम ने किया। प्रदर्शन में हजारों की संख्या में पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक शामिल हुए। रैली का मुख्य उद्देश्य प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार पर महंगाई, बिगड़ती कानून व्यवस्था और ऊर्जा संकट को लेकर दबाव बनाना था। प्रदर्शनकारियों ने गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद और ऊर्जा मंत्री इकबाल हसन महमूद के इस्तीफे की मांग की। नाहिद इस्लाम ने आरोप लगाया कि सरकार आम लोगों को सुरक्षा देने और बिजली तथा गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करने में नाकाम रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि दोनों मंत्री इस्तीफा नहीं देते हैं तो उनकी पार्टी देशभर में आंदोलन तेज करेगी और प्रधानमंत्री तारिक रहमान को घेरने के लिए प्रदर्शन आयोजित करेगी। लेकिन इस रैली में केवल घरेलू समस्याओं का मुद्दा ही नहीं उठा। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में एनसीपी के नेताओं और समर्थकों को ‘दिल्ली ना ढाका’ का नारा लगाते देखा गया। इसके बाद हजारों की भीड़ ने ‘ढाका-ढाका’ के नारे लगाए। रैली में नाहिद इस्लाम ने भारत पर बांग्लादेश के खिलाफ कथित साजिश करने के आरोप भी लगाए। उन्होंने सीमा पर बांग्लादेशी नागरिकों की मौत, असम और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के साथ कथित अत्याचार और दिल्ली में मस्जिदों को गिराने की योजनाओं का जिक्र किया। हालांकि, अपने भाषण में लगाए गए इन आरोपों के समर्थन में उन्होंने कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया। नाहिद इस्लाम ने भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारा संधि का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि यदि दिसंबर में इस समझौते का नवीनीकरण निष्पक्ष तरीके से नहीं हुआ और बांग्लादेश को उसके हिस्से का पानी नहीं मिला, तो जनता दोबारा सड़कों पर उतर सकती है। गौरतलब है कि भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को गंगा जल बंटवारा संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। यह समझौता 30 वर्षों के लिए किया गया था और इस साल दिसंबर में इसकी अवधि समाप्त होने वाली है। ऐसे में दोनों देशों के बीच इस संधि का नवीनीकरण एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक विषय बन गया है। इस रैली में एनसीपी के सांसद हसनात अब्दुल्ला भी शामिल हुए। वह इससे पहले भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर दिए गए विवादित बयानों के कारण चर्चा में रह चुके हैं। वहीं नाहिद इस्लाम भी जुलाई 2024 के उस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी। अब वह प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि प्रदर्शन की शुरुआत बांग्लादेश की आर्थिक और प्रशासनिक समस्याओं से हुई थी, लेकिन रैली के दौरान भारत से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता दी गई। इससे दोनों देशों के संबंधों पर राजनीतिक बयानबाजी का असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। फिलहाल बांग्लादेश में महंगाई, ऊर्जा संकट और राजनीतिक असंतोष के बीच विरोध प्रदर्शन जारी हैं। अब देखना होगा कि तारिक रहमान सरकार एनसीपी की मांगों पर क्या कदम उठाती है और भारत-बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारा संधि को लेकर दिसंबर में होने वाली बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है।


