साइबर ठगी करने वालों ने पुलिस की नजरों से बचने के लिए ऐसा तरीका अपनाया, जिसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। न कोई दफ्तर, न कोई स्थायी ठिकाना और न ही किसी एक जगह बैठकर लोगों को फोन करने का झंझट। ठगों ने अपनी एसयूवी गाड़ी को ही चलता-फिरता कॉल सेंटर बना लिया था। गाड़ी कभी दिल्ली के एक इलाके में खड़ी होती, तो कभी दूसरे इलाके में पहुंच जाती, लेकिन अंदर बैठकर लोगों को ठगने का कथित कारोबार लगातार चलता रहता। बैंक खातों को निशाना बनाने वाले इस नेटवर्क का दिल्ली पुलिस ने खुलासा किया है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। उनके कब्जे से सात मोबाइल फोन, 15 बैंक और मेट्रो कार्ड, चेकबुक, पासबुक और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद किए गए हैं।
पुलिस के मुताबिक, साइबर अपराधियों ने अपनी पहचान और गतिविधियों को छिपाने के लिए एक अलग रणनीति तैयार की थी। आमतौर पर साइबर ठगी करने वाले लोग किसी निश्चित स्थान या कार्यालय से अपना नेटवर्क संचालित करते हैं, लेकिन इस मामले में आरोपियों ने चलती एसयूवी को ही अपना ठिकाना बना लिया था। वे गाड़ी में बैठकर अलग-अलग स्थानों से फोन करते थे और पुलिस की निगरानी से बचने के लिए लगातार अपनी लोकेशन बदलते रहते थे।
इस कथित नेटवर्क का मुख्य उद्देश्य लोगों को फोन के माध्यम से निशाना बनाना और बैंकिंग से जुड़ी जानकारियों तथा खातों का दुरुपयोग करना बताया जा रहा है। आरोपियों की गतिविधियों को लेकर पुलिस ने जांच शुरू की और संदिग्धों तक पहुंचने के लिए निगरानी बढ़ाई। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, पुलिस की विस्तृत जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस गिरोह ने अब तक कितने लोगों को अपना शिकार बनाया है और कितनी रकम की ठगी की गई है।
गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से सात मोबाइल फोन बरामद किए हैं। इसके अलावा 15 बैंक और मेट्रो कार्ड भी मिले हैं। पुलिस को चेकबुक, पासबुक और कई अन्य दस्तावेज भी हाथ लगे हैं। जांच एजेंसियों के लिए ये बरामदगी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इनके माध्यम से गिरोह के बैंकिंग नेटवर्क, संदिग्ध लेनदेन और संभावित सहयोगियों के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है।
अब पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि बरामद किए गए बैंक कार्ड और दस्तावेज किन लोगों के नाम पर हैं। क्या इनका इस्तेमाल फर्जी बैंक खातों के संचालन में किया जा रहा था या फिर किसी दूसरे साइबर अपराध नेटवर्क से भी आरोपियों के संबंध जुड़े हुए थे? इसके अलावा सातों मोबाइल फोन की भी जांच की जा रही है, ताकि कॉल रिकॉर्ड, संदेशों और डिजिटल गतिविधियों के माध्यम से पूरे नेटवर्क का पता लगाया जा सके।
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आरोपियों ने पुलिस से बचने के लिए अपनी गाड़ी को ही सुरक्षित ठिकाने की तरह इस्तेमाल किया। लगातार बदलती लोकेशन के कारण उनकी गतिविधियों पर नजर रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता था। हालांकि, दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के बाद इस कथित नेटवर्क के तीन आरोपी गिरफ्त में आ चुके हैं।
यह घटना एक बार फिर बताती है कि साइबर अपराधी लोगों को ठगने के लिए लगातार नए तरीके अपना रहे हैं। ऐसे में किसी अनजान व्यक्ति को फोन पर बैंक खाते की जानकारी, ओटीपी, एटीएम पिन या अन्य गोपनीय विवरण साझा नहीं करना चाहिए। बैंक अधिकारी बनकर फोन करने वालों से भी सतर्क रहने की जरूरत है।
फिलहाल दिल्ली पुलिस गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर रही है। अब जांच का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल तीन लोगों का गिरोह था या इसके पीछे कोई बड़ा साइबर ठगी नेटवर्क भी काम कर रहा था? पुलिस की आगे की जांच में इस पूरे मामले से जुड़े कई और खुलासे होने की संभावना है।


