स्वस्थ खानपान कई गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इन्हीं आहार पद्धतियों में कीटोजेनिक (Keto) डाइट भी शामिल है, जिसे लेकर कुछ शोधों में कैंसर के जोखिम और उपचार के दौरान इसकी संभावित भूमिका पर अध्ययन किए गए हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इसे कैंसर से बचाव या इलाज का निश्चित तरीका नहीं माना जा सकता, बल्कि यह कुछ परिस्थितियों में सहायक रणनीति हो सकती है।
राजीव गांधी कैंसर संस्थान एवं रिसर्च सेंटर के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के डॉ. विनीत तलवार के अनुसार, कीटोजेनिक डाइट एक हाई-फैट, पर्याप्त प्रोटीन और बहुत कम कार्बोहाइड्रेट वाली आहार पद्धति है। इस डाइट में शरीर ग्लूकोज के बजाय फैट को ऊर्जा का मुख्य स्रोत बनाता है। इस प्रक्रिया को कीटोसिस (Ketosis) कहा जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कीटोजेनिक डाइट शरीर में इंसुलिन के स्तर और सूजन (Inflammation) को कम करने में मदद कर सकती है। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी संकेत मिले हैं कि कुछ प्रकार की कैंसर कोशिकाएं ग्लूकोज पर अधिक निर्भर होती हैं, इसलिए सीमित कार्बोहाइड्रेट वाला आहार कुछ परिस्थितियों में लाभकारी हो सकता है। हालांकि, इस विषय पर अभी और व्यापक शोध की आवश्यकता है।
डॉ. तलवार के अनुसार, PubMed पर प्रकाशित कुछ शोधों में भी कीटोजेनिक डाइट के संभावित लाभों का उल्लेख किया गया है। लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल कीटो डाइट अपनाने से कैंसर की रोकथाम की गारंटी नहीं दी जा सकती। कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए संतुलित जीवनशैली, नियमित व्यायाम, स्वस्थ वजन, धूम्रपान और तंबाकू से दूरी तथा समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
कीटोजेनिक डाइट हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होती। विशेष रूप से डायबिटीज, किडनी, लिवर या अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों को बिना डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन की सलाह के इस डाइट को शुरू नहीं करना चाहिए। गलत तरीके से अपनाई गई कीटो डाइट पोषण संबंधी असंतुलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी पैदा कर सकती है।
यदि आप कीटोजेनिक डाइट अपनाने की योजना बना रहे हैं, तो पहले किसी ऑन्कोलॉजिस्ट, चिकित्सक या क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट से सलाह लें, ताकि आपकी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार सही आहार योजना बनाई जा सके।


