अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में गुरुवार को हल्की गिरावट देखने को मिली। अमेरिकी महंगाई के ताजा आंकड़ों और फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदों के बीच निवेशक फिलहाल सावधानी बरत रहे हैं। हालांकि, हाल की तेजी को देखते हुए सोने की कीमतें अभी भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। बाजार की नजर अब आने वाले अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों और फेडरल रिजर्व के अगले नीतिगत संकेतों पर टिकी हुई है।
अमेरिका में जुलाई की उपभोक्ता महंगाई के आंकड़ों ने बाजार को कुछ राहत दी है। महंगाई में उम्मीद से ज्यादा तेजी नहीं दिखाई देने के कारण निवेशकों के बीच यह धारणा मजबूत हुई है कि फेडरल रिजर्व तुरंत ब्याज दर बढ़ाने से बच सकता है। महंगाई और रोजगार से जुड़े आंकड़े अब अमेरिकी केंद्रीय बैंक के अगले फैसले के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
सोने की कीमतों पर अमेरिकी ब्याज दरों का सीधा असर पड़ता है। जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो निवेशकों के लिए बॉन्ड और अन्य ब्याज देने वाले साधन ज्यादा आकर्षक हो जाते हैं। दूसरी तरफ सोना किसी तरह का ब्याज नहीं देता। ऐसे में ऊंची ब्याज दरें आमतौर पर सोने पर दबाव डाल सकती हैं। वहीं ब्याज दरों में कटौती या दरें स्थिर रहने की उम्मीद सोने को सहारा दे सकती है।
हालांकि इस समय तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। एक तरफ महंगाई के आंकड़ों से ब्याज दर बढ़ने की आशंका कुछ कम हुई है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी केंद्रीय बैंक की नीतिगत दिशा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वार्श ने अपने कार्यकाल में मौद्रिक नीति को लेकर पहले की तुलना में कम फॉरवर्ड गाइडेंस देने का रुख अपनाया है। इससे बाजार के लिए भविष्य की दरों का अनुमान लगाना कुछ मुश्किल हुआ है।
अब निवेशकों की नजर जैक्सन होल सम्मेलन पर है। इस सम्मेलन में फेडरल रिजर्व की नीतिगत दिशा और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण संकेत मिलने की उम्मीद रहती है। केविन वार्श के बयान पर बाजार की खास नजर होगी, क्योंकि उनके संकेत आने वाले महीनों में ब्याज दरों की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।
हाल की रिपोर्टों के मुताबिक, बाजार में फेड की आगे की नीति को लेकर असमंजस बना हुआ है। महंगाई में नरमी के संकेत जहां ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना को कम करते हैं, वहीं कुछ अधिकारी अभी भी महंगाई को लेकर चिंतित हैं। ऐसे में आने वाले आर्थिक आंकड़ों की भूमिका और बढ़ गई है।
सोने की कीमतों को अमेरिकी डॉलर की चाल से भी प्रभावित किया जाता है। डॉलर में कमजोरी आने पर दूसरे देशों की करेंसी रखने वाले खरीदारों के लिए सोना अपेक्षाकृत सस्ता हो जाता है। इससे सोने की मांग को सहारा मिल सकता है। हाल में डॉलर की कमजोरी भी सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट को सीमित करने वाले कारकों में शामिल रही है।
इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव भी सोने के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। जब बाजार में आर्थिक या राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ती है, तो निवेशक अक्सर सोने को सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में देखते हैं। इसी वजह से केंद्रीय बैंकों की सोने की खरीदारी भी बाजार के लिए अहम संकेत बनी हुई है।
केंद्रीय बैंकों की खरीदारी ने इस साल सोने की कीमतों को मजबूत आधार दिया है। खासकर वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और रिजर्व में विविधता लाने की कोशिश के बीच कई केंद्रीय बैंक सोने को रणनीतिक संपत्ति के तौर पर देख रहे हैं। इससे सोने की लंबी अवधि की मांग को समर्थन मिल रहा है।
हालांकि, निवेशकों को यह भी ध्यान रखना होगा कि सोने की कीमतें एकतरफा दिशा में नहीं चलतीं। ब्याज दरों की उम्मीद, डॉलर, महंगाई, वैश्विक तनाव और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी जैसे कई कारक एक साथ कीमतों को प्रभावित करते हैं। इसलिए आने वाले दिनों में किसी एक आंकड़े के आधार पर सोने की दिशा तय करना मुश्किल हो सकता है।
फिलहाल सोने में आई नरमी को बाजार की सामान्य हलचल के तौर पर देखा जा रहा है। बड़ी तस्वीर में सोना अभी भी मजबूत स्तरों के आसपास कारोबार कर रहा है और अगस्त में इसकी कीमतों में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई है। अब बाजार यह जानना चाहता है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व आगे ब्याज दरों को लेकर क्या रुख अपनाता है।
अगर महंगाई और रोजगार के आंकड़े फेड को नरम नीति अपनाने का संकेत देते हैं, तो सोने को आगे भी समर्थन मिल सकता है। वहीं अगर महंगाई फिर से तेज होती है और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ती है, तो सोने पर दबाव देखने को मिल सकता है। ऐसे में जैक्सन होल सम्मेलन और आने वाले आर्थिक आंकड़े सोने की अगली चाल के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं।


