सुभाष चंद्र की व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया को लेकर विवाद अब और गहराता दिखाई दे रहा है। करीब 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक के स्वीकार किए गए लेनदार दावों के मुकाबले महज करीब 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी मिलने के बाद कई बड़े वित्तीय संस्थानों ने इस फैसले पर आपत्ति जताई है। केनरा बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने इस योजना का विरोध किया था और अब ये संस्थान राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण यानी NCLAT का रुख करने की तैयारी में हैं। ऐसे में यह मामला दिवाला समाधान प्रक्रिया में लेनदारों के अधिकार और बेहद कम पुनर्भुगतान राशि को लेकर बड़ी कानूनी लड़ाई में बदल सकता है।
मामला सुभाष चंद्र की व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसे इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस की ओर से दायर की गई याचिका के बाद शुरू किया गया था। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण यानी NCLT के सामने सुभाष चंद्र की ओर से एक पुनर्भुगतान योजना पेश की गई थी। न्यायाधिकरण ने इस योजना को मंजूरी देते हुए स्वीकार किए गए 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक के दावों के निपटारे के लिए करीब 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान की व्यवस्था को स्वीकृति दी।
यहीं से विवाद का सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ। लेनदारों के स्वीकार किए गए दावों की राशि जहां हजारों करोड़ रुपये में है, वहीं प्रस्तावित भुगतान कुछ करोड़ रुपये का ही है। इसी बड़े अंतर को लेकर कई वित्तीय संस्थानों ने योजना का विरोध किया। उनका कहना है कि उन्होंने मतदान के दौरान इस प्रस्ताव के खिलाफ अपना मत दिया था, लेकिन बहुमत के आधार पर योजना को मंजूरी मिल गई।
एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस के मुताबिक, उसके साथ केनरा बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की संयुक्त वोटिंग हिस्सेदारी 8.45 प्रतिशत है। इन तीनों संस्थानों ने पुनर्भुगतान योजना के खिलाफ मतदान किया था। वहीं योजना को दूसरे वित्तीय लेनदारों की ओर से मिले 80.81 प्रतिशत मतों के आधार पर मंजूरी मिली। यानी जिन संस्थानों का वोटिंग शेयर कम था, उनकी आपत्ति बहुमत के सामने टिक नहीं सकी।
केनरा बैंक की इस प्रक्रिया में 1.60 प्रतिशत मत हिस्सेदारी बताई गई है, जबकि यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की हिस्सेदारी 0.76 प्रतिशत और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस की 6.09 प्रतिशत थी। तीनों को मिलाकर यह आंकड़ा 8.45 प्रतिशत होता है। केनरा बैंक ने इस योजना का विरोध करने के साथ-साथ मामले में वित्तीय जांच कराने की मांग भी की थी, लेकिन पर्याप्त वोट न होने के कारण उसका प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।
अब केनरा बैंक ने संकेत दिया है कि वह NCLAT में NCLT के आदेश को चुनौती देगा। वहीं यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने भी कहा है कि उसने अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं के साथ मिलकर योजना का विरोध किया था। बैंक का कहना है कि NCLT के सामने भी उसने इसके अनुमोदन का विरोध किया, लेकिन कुछ निजी लेनदारों के बहुमत मत के चलते योजना को मंजूरी मिल गई।
इस मामले में एचडीएफसी बैंक की आपत्ति भी सामने आ चुकी है। बैंक ने बताया कि उसने भी प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया था, लेकिन बहुमत के आधार पर योजना मंजूर हो गई। बैंक अब NCLAT में अपील करने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। एचडीएफसी बैंक के मुताबिक, न्यायाधिकरण के आदेश में उसके कुल दावे का केवल करीब 3.2 प्रतिशत हिस्सा ही स्वीकार किया गया है।
अब इस मामले की अगली लड़ाई अपीलीय स्तर पर होगी। NCLAT में होने वाली सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि वहां यह सवाल उठ सकता है कि इतनी बड़ी राशि के स्वीकार किए गए दावों के मुकाबले इतनी कम रकम की पुनर्भुगतान योजना किस आधार पर मंजूर की गई और क्या दिवाला प्रक्रिया के नियमों के तहत लेनदारों के हितों का पर्याप्त संरक्षण हुआ है।
हालांकि किसी योजना का बहुमत लेनदारों द्वारा मंजूर किया जाना अपने आप में उसे अंतिम रूप से विवाद से बाहर नहीं करता। असंतुष्ट लेनदार कानूनी प्रक्रिया के तहत अपील कर सकते हैं और अब यही रास्ता इन बैंकों ने चुना है। NCLAT में होने वाली सुनवाई के दौरान NCLT के फैसले, पुनर्भुगतान योजना और लेनदारों की आपत्तियों पर विस्तार से विचार हो सकता है।
फिलहाल 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक के दावों और करीब 6.5 करोड़ रुपये के प्रस्तावित भुगतान के बीच का भारी अंतर इस पूरे मामले को चर्चा में ले आया है। अब नजर NCLAT पर है कि वह इस योजना को मौजूदा रूप में बरकरार रखता है या लेनदारों की आपत्तियों के बाद इसमें किसी तरह के बदलाव की जरूरत महसूस करता है। आने वाला फैसला न सिर्फ सुभाष चंद्र की व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि बड़े दावों और कम भुगतान वाली ऐसी दिवाला समाधान योजनाओं को लेकर भी एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है।


