सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI के कामकाज को लेकर बुधवार को बड़ा दखल दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा का मौजूदा पद पर बने रहना साल 2030 तक की स्थायी व्यवस्था नहीं माना जा सकता। अदालत ने उनके पद को पहली नजर में केवल ‘Pro-Tem’ यानी अस्थायी व्यवस्था बताया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह टिप्पणी की। पीठ में जस्टिस जोयमाल्य बागची और वी. मोहना भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि नई BCI का गठन चुनाव के जरिए होने और उसके नए पदाधिकारियों के चुने जाने तक ही मौजूदा व्यवस्था जारी रह सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने BCI के कामकाज पर निगरानी को और मजबूत करते हुए यह भी निर्देश दिया कि जब तक नए चुनाव के जरिए संस्था का पुनर्गठन नहीं हो जाता, तब तक BCI द्वारा लिए जाने वाले हर नीतिगत फैसले में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
यानी अब BCI के महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों में देश के शीर्ष कानूनी अधिकारियों की भूमिका भी रहेगी। कोर्ट का यह निर्देश बार काउंसिल ऑफ इंडिया की कार्यप्रणाली और उसके निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर काफी अहम माना जा रहा है।
दरअसल, यह पूरा मामला राज्य बार काउंसिल के चुनावों से जुड़ी कई याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। इन याचिकाओं में BCI चेयरमैन के तौर पर मनन कुमार मिश्रा के बने रहने और चेयरमैन तथा वाइस-चेयरमैन के कार्यकाल को 2030 तक बढ़ाने वाले नोटिफिकेशन्स की वैधता को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए थे और अदालत से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने BCI के पुनर्गठन और चुनाव की प्रक्रिया को लेकर अपनी चिंता जाहिर की।
अदालत की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि मनन कुमार मिश्रा का पद पर बने रहना अपने आप में 2030 तक के कार्यकाल की मंजूरी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया इसे Pro-Tem व्यवस्था माना है।
इसका सीधा मतलब यह है कि मौजूदा चेयरमैन की भूमिका नई निर्वाचित BCI के पदाधिकारियों के चुने जाने तक की अंतरिम व्यवस्था के रूप में देखी जा रही है। नई BCI के गठन और नए पदाधिकारियों के चुनाव के बाद मौजूदा व्यवस्था खत्म हो सकती है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया देश में वकीलों की शीर्ष वैधानिक संस्था है। वकीलों की पेशेवर आचार संहिता, कानूनी शिक्षा और बार से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में BCI की भूमिका रहती है। इसलिए संस्था के प्रशासन और चुनाव से जुड़े किसी भी विवाद का व्यापक असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से BCI के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है। खासकर तब, जब अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि नए चुनाव और पुनर्गठन तक नीतिगत फैसलों में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को सक्रिय रूप से शामिल किया जाए।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि BCI के नए चुनाव कब होते हैं और संस्था का नया ढांचा किस तरह सामने आता है। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि 2030 तक कार्यकाल बढ़ाने वाले नोटिफिकेशन्स को लेकर आगे अदालत क्या फैसला सुनाती है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि मनन कुमार मिश्रा का मौजूदा कार्यकाल 2030 तक की स्थायी मंजूरी नहीं है और उनकी वर्तमान भूमिका को अदालत ने प्रथम दृष्टया Pro-Tem व्यवस्था माना है।


