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पीयूष गोयल का यूरोप को दोटूक जवाब! जलवायु परिवर्तन पर भारत का पक्ष रखकर खोली विकसित देशों की पोल

जर्मनी की राजधानी बर्लिन में जलवायु परिवर्तन को लेकर हुई चर्चा के दौरान केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत का पक्ष मजबूती से रखा। चर्चा में उन्होंने भारत की आबादी, कार्बन उत्सर्जन और स्वच्छ ऊर्जा के प्रयासों का जिक्र करते हुए विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाए। उनका संदेश साफ था कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी केवल भारत जैसे विकासशील देशों पर नहीं डाली जा सकती। पर्यावरण को लेकर वैश्विक बहस में हर देश को अपने योगदान और जिम्मेदारियों का हिसाब देना होगा।

दरअसल, जलवायु परिवर्तन आज दुनिया के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। बढ़ता तापमान, मौसम में असामान्य बदलाव, जंगलों में आग, बाढ़ और सूखे जैसी घटनाएं कई देशों को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में दुनिया के अलग-अलग देशों के प्रतिनिधि इस बात पर चर्चा करते हैं कि उत्सर्जन कम करने के लिए कौन-से कदम उठाए जाएं और इसकी जिम्मेदारी किस तरह बांटी जाए। लेकिन इस बहस में विकसित और विकासशील देशों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।

भारत का तर्क रहा है कि जलवायु परिवर्तन की समस्या को समझते समय ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और देशों की आर्थिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विकसित देशों ने औद्योगिकीकरण के लंबे दौर में बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जित किया है। दूसरी ओर, भारत जैसे विकासशील देश आज भी अपनी आबादी की ऊर्जा जरूरतों, रोजगार और आर्थिक विकास को पूरा करने के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं।

चर्चा के दौरान पीयूष गोयल ने भारत की विशाल आबादी और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसके हिस्से का उल्लेख किया। उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, उन्होंने कहा कि दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, जबकि वैश्विक उत्सर्जन में भारत का हिस्सा तीन प्रतिशत से कम है। इन आंकड़ों का सटीक आकलन संबंधित वर्ष और उत्सर्जन की गणना के तरीके पर निर्भर करता है, लेकिन भारत अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और ऐतिहासिक जिम्मेदारी को लगातार महत्वपूर्ण मुद्दा बनाता रहा है।

भारत का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल भाषण देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए स्वच्छ ऊर्जा में निवेश, नवीकरणीय बिजली उत्पादन, ऊर्जा दक्षता और प्रदूषण कम करने वाली तकनीकों को बढ़ावा देना आवश्यक है। भारत ने सौर ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की क्षमता बढ़ाने के लिए कई पहल की हैं। देश की चुनौती यह भी है कि करोड़ों लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करते हुए विकास की गति बनाए रखी जाए।

इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू यूरोपीय देशों की भूमिका भी है। यूरोप ने औद्योगिक विकास के दौरान जीवाश्म ईंधन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। आज कई यूरोपीय देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कड़े पर्यावरणीय नियमों और उत्सर्जन में कटौती की नीतियों की वकालत करते हैं। भारत का पक्ष यह है कि इन प्रयासों के साथ विकसित देशों को विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहायता और स्वच्छ तकनीक उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए।

भारत और यूरोप के बीच ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी अलग-अलग परिस्थितियां हैं। रूस से ऊर्जा खरीद और जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल जैसे मुद्दे अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं में बार-बार उठते रहे हैं। भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेने की बात कही है। वहीं, यूरोपीय देशों की ऊर्जा नीतियां भी समय के साथ बदलती रही हैं। इसलिए इन मुद्दों का आकलन करते समय अलग-अलग देशों की नीतियों और परिस्थितियों को तथ्यों के आधार पर देखना जरूरी है।

पीयूष गोयल के इस रुख को भारत की जलवायु नीति और विकासशील देशों के हितों से जोड़कर देखा जा रहा है। भारत लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयास न्यायसंगत होने चाहिए और विकासशील देशों पर उनकी परिस्थितियों से परे अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।

हालांकि, बर्लिन में हुई चर्चा के दौरान संबंधित महिला प्रतिनिधि की टिप्पणियों, पूरे संवाद और पीयूष गोयल के शब्दशः जवाब का विस्तृत सत्यापित विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी प्रतिनिधि के व्यवहार या प्रतिक्रिया को लेकर बढ़ा-चढ़ाकर दावा करने के बजाय चर्चा के मुख्य मुद्दों पर ध्यान देना अधिक उचित है।

कुल मिलाकर, जलवायु परिवर्तन पर भारत का रुख स्पष्ट है—पर्यावरण की रक्षा जरूरी है, लेकिन इसके लिए सभी देशों की जिम्मेदारियों का आकलन ऐतिहासिक उत्सर्जन, वर्तमान परिस्थितियों और आर्थिक क्षमताओं के आधार पर होना चाहिए। अब देखना होगा कि वैश्विक जलवायु वार्ताओं में विकसित और विकासशील देशों के बीच इस मुद्दे पर सहमति बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

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