Top 5 This Week

spot_img

Related Posts

वैश्विक संकट के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत! RBI बुलेटिन में घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र को मिला श्रेय, महंगाई बढ़ने से नई चुनौती

दुनियाभर में भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक खींचतान और महंगाई का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन इन चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाले कई कारक सामने आए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के अक्टूबर बुलेटिन में घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र की मजबूती को आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। हालांकि, खुदरा महंगाई में हालिया बढ़ोतरी और वैश्विक बाजारों में जारी उथल-पुथल ने चिंता भी बढ़ाई है। ऐसे में सवाल है कि आखिर वैश्विक संकट के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को सहारा कहां से मिल रहा है और आगे कौन-सी चुनौतियां सामने आ सकती हैं?

भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई के अक्टूबर बुलेटिन में प्रकाशित ‘अर्थव्यवस्था की स्थिति’ शीर्षक वाले लेख के मुताबिक, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाओं ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है। इन परिस्थितियों का असर ऊर्जा की कीमतों, व्यापार और वित्तीय बाजारों पर पड़ सकता है। इसके बावजूद भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद और नीतिगत उपाय विकास को समर्थन दे रहे हैं।

भारत ऊर्जा का शुद्ध आयातक है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से देश के आयात खर्च और महंगाई पर दबाव पड़ सकता है। इसके बावजूद घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र की मजबूती भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सहारा बनी हुई है। देश में वस्तुओं और सेवाओं की मांग आर्थिक गतिविधियों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उद्योग और सेवा क्षेत्र से जुड़े आंकड़े भी आर्थिक गतिविधियों की स्थिति को समझने में मदद करते हैं।

वैश्विक स्तर पर भी आर्थिक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण बनी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की ओर से वर्ष 2026 और 2027 के वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के अनुमानों में सुधार के बावजूद कई जोखिम कायम हैं। इनमें बढ़ती महंगाई, सरकारों पर बढ़ता कर्ज और राजकोषीय स्थिरता से जुड़ी चिंताएं शामिल हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में सरकारी बॉन्ड पर ऊंची प्रतिफल दरें भी वित्तीय बाजारों को प्रभावित कर सकती हैं। वहीं, कृत्रिम मेधा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हो रहे बदलाव वैश्विक उत्पादकता और आर्थिक विकास के लिए अवसर पैदा कर सकते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक खुदरा महंगाई भी है। आरबीआई के बुलेटिन में बताया गया कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई पर आधारित खुदरा महंगाई में हाल के महीनों में बढ़ोतरी हुई है। इसके प्रभाव के अधिक क्षेत्रों तक फैलने के संकेत भी सामने आए हैं। यदि महंगाई का दबाव लगातार बना रहता है, तो मौद्रिक नीति के रुख में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, ब्याज दरों को लेकर कोई भी फैसला महंगाई, आर्थिक विकास और अन्य आर्थिक परिस्थितियों के आकलन के आधार पर किया जाता है।

विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए भी आरबीआई ने नियामकीय कदम उठाए हैं। बुलेटिन के अनुसार, विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी से जुड़ी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए कई उपाय किए गए। इसके अलावा, एफसीएनआर (बी) अदला-बदली सुविधा के तहत मिले मजबूत प्रवाह से विदेशी मुद्रा भंडार को समर्थन मिला। विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की बाहरी आर्थिक चुनौतियों से निपटने की क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।

विदेशी निवेश के मोर्चे पर भी अगस्त 2026 में मजबूती दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई के साथ बाह्य वाणिज्यिक उधारी और विदेश से भेजे गए धन के प्रवाह में भी मजबूती आई। संचार, विविध सेवाओं और विनिर्माण क्षेत्रों में कुल एफडीआई का दो-तिहाई से अधिक निवेश आया। अमेरिका, सिंगापुर और मॉरीशस से लगभग 72 प्रतिशत एफडीआई प्रवाह हुआ। यह निवेश के स्रोतों और उन क्षेत्रों की जानकारी देता है, जहां विदेशी निवेशकों की भागीदारी महत्वपूर्ण रही।

हालांकि, शेयर बाजारों में निवेशकों के लिए परिस्थितियां आसान नहीं रहीं। बुलेटिन के मुताबिक, सितंबर और अक्टूबर में 19 अक्टूबर तक भारतीय शेयर बाजारों में ज्यादातर गिरावट का रुख रहा। वैश्विक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वित्तीय परिस्थितियों के सख्त होने से निवेशकों की जोखिम लेने की इच्छा प्रभावित हुई। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली से बाजार पर दबाव पड़ा, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशक शुद्ध खरीदार बने रहे।

आरबीआई ने यह भी स्पष्ट किया कि बुलेटिन में प्रकाशित लेख के विचार उसके लेखकों के हैं और उन्हें केंद्रीय बैंक का आधिकारिक रुख नहीं माना जाना चाहिए।

कुल मिलाकर, वैश्विक चुनौतियों के बावजूद घरेलू मांग, सेवा क्षेत्र और निवेश प्रवाह भारतीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाले महत्वपूर्ण कारक हैं। लेकिन महंगाई, कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक तनाव और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां आगे भी आर्थिक दिशा को प्रभावित कर सकती हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत विकास की गति बनाए रखते हुए महंगाई और बाहरी आर्थिक जोखिमों से किस तरह निपटता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles