मध्य पूर्व की बदलती भू-राजनीति के बीच इजरायल और तुर्की के संबंध एक बार फिर चर्चा में हैं। इजरायल की कैबिनेट ने 1915 में ऑटोमन साम्राज्य के दौरान अर्मेनियाई लोगों के साथ हुई घटनाओं को आधिकारिक तौर पर नरसंहार के रूप में मान्यता देने संबंधी एक प्रस्ताव को मंजूरी दी है। हालांकि यह प्रस्ताव अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ है और इसे कानून बनने के लिए इजरायली संसद की मंजूरी मिलना बाकी है।
यदि संसद भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है तो इजरायल उन देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जिन्होंने 1915 की घटनाओं को अर्मेनियाई नरसंहार के रूप में आधिकारिक मान्यता दी है। दूसरी ओर तुर्की लंबे समय से इस शब्द का विरोध करता रहा है और उसका कहना है कि उस दौर की घटनाओं को नरसंहार नहीं कहा जा सकता।
विश्लेषकों का मानना है कि इजरायल का यह कदम केवल ऐतिहासिक मुद्दे से जुड़ा नहीं है, बल्कि मौजूदा कूटनीतिक परिस्थितियों से भी प्रभावित है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से गाजा संघर्ष के बाद, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन ने कई बार इजरायल की नीतियों की सार्वजनिक आलोचना की है। इसके बाद दोनों देशों के संबंधों में लगातार तनाव देखने को मिला है।
विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि इस प्रस्ताव के जरिए इजरायल तुर्की पर नैतिक और कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। हालांकि इस संबंध में अलग-अलग विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है और इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।
इस पूरे घटनाक्रम का असर दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। तुर्की लंबे समय से पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध रखता है और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के पक्ष में बयान देता रहा है। वहीं भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अर्मेनिया के साथ रक्षा और रणनीतिक सहयोग को मजबूत किया है। दोनों देशों के बीच रक्षा उपकरणों की आपूर्ति और सुरक्षा सहयोग भी बढ़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच भारत और अर्मेनिया के मजबूत होते संबंध भारत के रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि भारत और इजरायल तुर्की के खिलाफ किसी संयुक्त रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसे मुख्य रूप से अलग-अलग देशों की स्वतंत्र विदेश नीति और उनके रणनीतिक हितों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
इजरायल की कैबिनेट का यह प्रस्ताव आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का अहम विषय बन सकता है। यदि इजरायली संसद इसे मंजूरी देती है तो तुर्की की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। इससे इजरायल-तुर्की संबंधों के साथ-साथ क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।
फिलहाल दुनिया की नजर इजरायली संसद की अगली प्रक्रिया पर टिकी हुई है। संसद के फैसले के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि यह प्रस्ताव कानून का रूप लेता है या नहीं और इसका दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों तथा व्यापक क्षेत्रीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ता है।


