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30 साल बाद लौटा रूस का महादानव! NATO और अमेरिका की बढ़ी टेंशन

रूस का आधुनिकीकृत एडमिरल नाखिमोव क्रूज़र एक बार फिर सुर्खियों में है। सोवियत दौर में निर्मित यह किरोव क्लास युद्धपोत लंबे समय तक अपग्रेडेशन के लिए डॉकयार्ड में रहा। अब वर्षों के आधुनिकीकरण के बाद यह अंतिम परीक्षणों के लिए तैयार बताया जा रहा है।

किरोव क्लास क्रूज़र दुनिया के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संचालित युद्धपोतों में शामिल है। करीब 28 हजार टन वजनी यह जहाज आकार और मारक क्षमता दोनों मामलों में बेहद प्रभावशाली माना जाता है। इसकी लंबाई और क्षमता इसे सामान्य डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट श्रेणी के जहाजों से कहीं आगे खड़ा करती है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस युद्धपोत में बड़ी संख्या में आधुनिक मिसाइल सिस्टम लगाए गए हैं। इसमें लंबी दूरी की एयर डिफेंस मिसाइलें, एंटी-शिप मिसाइलें और अत्याधुनिक हाइपरसोनिक हथियार तैनात किए जाने की बात कही जा रही है। रूस का दावा है कि यह जहाज समुद्र, हवा और मिसाइल खतरों से एक साथ निपटने में सक्षम होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि एडमिरल नाखिमोव केवल एक युद्धपोत नहीं बल्कि रूस की नौसैनिक शक्ति का प्रतीक है। यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करने में जुटा है। ऐसे में इस युद्धपोत की वापसी को एक रणनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

हालांकि इस परियोजना की लागत रूस के लिए काफी भारी रही है। लंबे समय तक चले आधुनिकीकरण और आर्थिक दबावों के कारण रूस को अपने दूसरे किरोव क्लास जहाजों के भविष्य पर भी पुनर्विचार करना पड़ा। बावजूद इसके, मॉस्को ने एडमिरल नाखिमोव को आधुनिक बनाने में भारी निवेश किया है।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि आर्कटिक क्षेत्र, उत्तरी समुद्री मार्ग और अटलांटिक महासागर में बढ़ती सैन्य प्रतिस्पर्धा के बीच इस युद्धपोत की तैनाती रूस की रणनीतिक स्थिति को मजबूत कर सकती है। वहीं अमेरिका और नाटो भी क्षेत्र में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ा रहे हैं।

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