देश की राजनीति में परिसीमन बिल को लेकर हलचल तेज हो गई है। केंद्र सरकार के इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर अब विपक्ष के कुछ नेताओं के सुर बदलते नजर आ रहे हैं। पहले एनसीपी (शरद पवार गुट) की नेता सुप्रिया सुले ने कुछ शर्तों के साथ समर्थन की बात कही थी और अब शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने भी ऐसा बयान दिया है, जिससे राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं।
संजय राउत ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि विपक्षी दल प्रस्तावित परिसीमन बिल का विरोध करेंगे, लेकिन यदि सरकार विपक्ष द्वारा सुझाए गए संशोधनों को स्वीकार करती है, तो उनकी पार्टी इस बिल का समर्थन करने पर विचार कर सकती है।
राउत के इस बयान को राजनीतिक गलियारों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि शिवसेना (यूबीटी) अब तक केंद्र सरकार की नीतियों की मुखर आलोचक रही है। ऐसे में परिसीमन जैसे अहम मुद्दे पर पार्टी की ओर से समर्थन की संभावना जताना नई राजनीतिक चर्चा को जन्म दे रहा है।
इससे एक दिन पहले सुप्रिया सुले ने भी कहा था कि यदि सरकार उनकी पार्टी की मांगों और सुझावों पर विचार करती है, तो उनकी पार्टी भी लोकसभा में परिसीमन बिल का समर्थन कर सकती है। लगातार दो विपक्षी नेताओं के ऐसे बयानों ने राजनीतिक समीकरणों को लेकर अटकलें तेज कर दी हैं।
संजय राउत यह बयान नागपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान दे रहे थे। वे वहां आगामी ‘राम रक्षा आंदोलन’ को लेकर भी चर्चा कर रहे थे, जिसे शिवसेना (यूबीटी) अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े कथित दान घोटाले के मुद्दे पर आयोजित करने की बात कह रही है।
हालांकि, राउत ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी बिना शर्त समर्थन नहीं करेगी। उनका कहना है कि यदि सरकार विपक्ष की चिंताओं और सुझावों को गंभीरता से शामिल करती है, तभी समर्थन पर विचार किया जाएगा।
परिसीमन यानी Delimitation वह प्रक्रिया है, जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का पुनर्निर्धारण किया जाता है। यह विषय लंबे समय से राजनीतिक और संवैधानिक बहस का हिस्सा रहा है, क्योंकि इसका सीधा असर राज्यों के प्रतिनिधित्व और राजनीतिक संतुलन पर पड़ता है।
फिलहाल सरकार की ओर से इस मुद्दे पर विपक्ष की मांगों को लेकर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्ष के कुछ दल संशोधनों के साथ समर्थन देने को तैयार होते हैं, तो संसद में इस विषय पर नई राजनीतिक रणनीति देखने को मिल सकती है।
हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित संशोधन क्या होंगे और सरकार उन्हें स्वीकार करेगी या नहीं। इसलिए फिलहाल समर्थन की संभावना केवल नेताओं के बयानों तक सीमित है।
अब सभी की नजर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच होने वाली आगे की बातचीत पर टिकी है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि परिसीमन बिल को लेकर राजनीतिक सहमति बनती है या फिर संसद में इस पर तीखी बहस देखने को मिलेगी।


