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Meta के बाद अब दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी सरकार के रडार पर, कंपनियों से होगी पूछताछ और जिम्मेदारियों की जांच

भारत सरकार अब Meta के बाद दूसरे सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी बातचीत के लिए बुलाने की तैयारी कर रही है। सरकार यह जांच करना चाहती है कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के तहत इंटरमीडियरी यानी मध्यस्थ की श्रेणी में आते हैं या नहीं और क्या वे कानून के मुताबिक अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।

यह कदम ऐसे समय उठाया जा रहा है, जब हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े एक फेसबुक वीडियो को हटाए जाने के मामले में Meta की ओर से माफी मांगी गई थी। इस घटना के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कंटेंट मॉडरेशन और उनकी जिम्मेदारियों को लेकर चर्चा तेज हुई है।

सूत्रों के मुताबिक, सरकार आने वाले समय में अन्य प्लेटफॉर्म के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत कर सकती है। इस दौरान उनसे उनके कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम, प्लेटफॉर्म की भूमिका और भारतीय कानून के तहत उनकी जिम्मेदारियों को लेकर सवाल किए जा सकते हैं।

सरकार खास तौर पर यह समझने की कोशिश करेगी कि कोई डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल यूजर्स द्वारा अपलोड किए गए कंटेंट को होस्ट करता है या फिर वह खुद यह तय करने में सक्रिय भूमिका निभाता है कि किस यूजर को कौन-सा कंटेंट दिखाया जाए। यही अंतर किसी प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण हो सकता है।

अगर कोई प्लेटफॉर्म केवल एक मध्यस्थ के रूप में यूजर्स और कंटेंट के बीच तकनीकी सुविधा उपलब्ध कराता है, तो उसके लिए अलग कानूनी प्रावधान लागू होते हैं। लेकिन अगर प्लेटफॉर्म कंटेंट को चुनने, व्यवस्थित करने या यूजर्स तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाता है, तो उसकी जिम्मेदारियों को लेकर अलग सवाल खड़े हो सकते हैं।

यही वजह है कि सरकार अब Meta के अलावा दूसरे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म के काम करने के तरीके को भी समझना चाहती है। सरकार यह देख सकती है कि प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिदम और कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के जरिए किस तरह की भूमिका निभा रहे हैं और भारतीय नियमों के तहत उनकी जवाबदेही किस स्तर तक बनती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े वीडियो को हटाने की घटना ने इस बहस को और तेज कर दिया है। Meta की ओर से इस मामले में माफी मांगे जाने के बाद अब सवाल उठ रहा है कि क्या दूसरे प्लेटफॉर्म पर भी इसी तरह की परिस्थितियों में कंटेंट हटाने या दिखाने से जुड़े फैसलों की समीक्षा होनी चाहिए।

सरकार की संभावित बातचीत का एक अहम उद्देश्य यह भी हो सकता है कि सोशल मीडिया कंपनियां भारतीय कानून और स्थानीय नियमों का पालन किस तरह कर रही हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए सरकार के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि कंपनियां अपनी कानूनी जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से समझें और उनका पालन करें।

हालांकि, किसी प्लेटफॉर्म को इंटरमीडियरी माना जाएगा या नहीं, इसका फैसला उसके काम करने के तरीके और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर होगा। इसलिए सरकार की ओर से होने वाली बातचीत और जांच के बाद ही स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो सकेगी।

फिलहाल Meta के बाद दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी सरकार के रडार पर आते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले दिनों में इन कंपनियों के साथ होने वाली बातचीत से यह साफ हो सकता है कि भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारियों को लेकर सरकार किस दिशा में आगे बढ़ना चाहती है।

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