भारत और चीन के रिश्तों में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल दो दिन के चीन दौरे पर पहुंचे हैं और बीजिंग में उन्होंने चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग से मुलाकात की है। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर बातचीत का सिलसिला जारी है और दोनों देश पूर्वी लद्दाख में लंबे समय तक चले सैन्य तनाव के बाद रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं।
अजीत डोभाल चीन में भारत-चीन सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि यानी स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव मैकेनिज्म के तहत बातचीत के 25वें दौर में हिस्सा लेने पहुंचे हैं। इस बातचीत का मकसद सिर्फ सीमा पर मौजूदा स्थिति को संभालना नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच शांति और स्थिरता बनाए रखने के रास्ते तलाशना भी है। यही वजह है कि डोभाल का चीन दौरा सामान्य राजनयिक यात्रा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर चीन जैसे संवेदनशील पड़ोसी देश के साथ बातचीत के लिए भारत ने अजीत डोभाल को ही क्यों चुना? इसका जवाब उनकी भूमिका में छिपा है। डोभाल सिर्फ भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नहीं हैं, बल्कि सीमा विवाद से जुड़े विशेष प्रतिनिधि भी हैं। यानी सीमा से जुड़े सबसे संवेदनशील मुद्दों पर भारत की तरफ से बातचीत करने के लिए उन्हें विशेष जिम्मेदारी दी गई है।
पूर्वी लद्दाख में 2020 के बाद भारत और चीन के बीच सैन्य तनाव ने दोनों देशों के रिश्तों को काफी प्रभावित किया था। सीमा पर बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती हुई और कई दौर की सैन्य तथा कूटनीतिक बातचीत के बाद तनाव को कम करने की कोशिश की गई। इसके बाद दोनों देशों के बीच संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की दिशा में कदम उठाए गए।
अब डोभाल का चीन दौरा इसी प्रक्रिया का अगला महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। बातचीत में सीमा पर शांति और स्थिरता को मजबूत करने के साथ-साथ दोनों देशों के व्यापक संबंधों को बेहतर बनाने पर भी चर्चा हो रही है। हालांकि सीमा विवाद का अंतिम समाधान अभी भी आसान नहीं है और दोनों देशों के बीच कई संवेदनशील मुद्दे मौजूद हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग के साथ डोभाल की मुलाकात भी काफी महत्वपूर्ण है। दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के तरीकों पर चर्चा की। इसके अलावा द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के रास्तों पर भी बातचीत हुई। यानी संदेश साफ है कि सीमा विवाद के बावजूद भारत और चीन बातचीत का रास्ता बंद नहीं करना चाहते।
अब चर्चा एक और संभावित घटनाक्रम को लेकर भी है। भारत और चीन के बीच रिश्तों में सुधार की कोशिशों के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को लेकर भी अटकलें लगती रही हैं। अगर दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच मुलाकात होती है तो यह रिश्तों को नई दिशा देने वाला बड़ा घटनाक्रम हो सकता है। हालांकि किसी संभावित यात्रा को लेकर अंतिम और आधिकारिक घोषणा का इंतजार जरूरी है।
भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता सीमा पर शांति बनाए रखना है। भारत लगातार यह मानता रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना दोनों देशों के रिश्तों में वास्तविक प्रगति मुश्किल होगी। इसी वजह से सैन्य कमांडरों की बातचीत के साथ-साथ विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
डोभाल की बातचीत में चीन के साथ सीमा विवाद का जटिल मुद्दा तो है ही, लेकिन इसके साथ दोनों देशों के व्यापक संबंध भी जुड़े हैं। व्यापार, रणनीतिक संबंध, क्षेत्रीय सुरक्षा और एशिया में बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी भारत और चीन के रिश्तों को प्रभावित करती हैं।
यही कारण है कि डोभाल का चीन दौरा केवल एक बैठक तक सीमित नहीं माना जा रहा। यह ऐसे समय हो रहा है जब भारत चीन के साथ रिश्तों में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ सीमा पर अपने सुरक्षा हितों को लेकर भारत बेहद सतर्क है, वहीं दूसरी तरफ बातचीत और कूटनीति के जरिए तनाव को कम करने का प्रयास भी जारी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता से क्या कोई बड़ा रास्ता निकलता है? क्या सीमा पर भरोसा और बढ़ेगा? क्या दोनों देशों के रिश्ते और सामान्य होंगे? और क्या आने वाले समय में भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच कोई बड़ी मुलाकात देखने को मिलेगी?
फिलहाल अजीत डोभाल का चीन दौरा इस बात का संकेत जरूर है कि सीमा विवाद के बावजूद भारत और चीन के बीच बातचीत का चैनल सक्रिय है। आने वाले दिनों में इस वार्ता से निकलने वाले संकेत बेहद महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि इनका असर सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि भारत-चीन के पूरे रिश्ते पर पड़ सकता है।


