फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक ऐतिहासिक धार्मिक और सांस्कृतिक अवसर देखने को मिला। यहां देश के पहले पारंपरिक हिंदू मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा विधि वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुई। बीएपीएस अक्षरधाम संस्थान के वर्तमान गुरु परम पूज्य महंतस्वामी महाराज ने प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव की विधि संपन्न कर मंदिर का लोकार्पण किया। इसके साथ ही मंदिर के द्वार अब दर्शनार्थियों और श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं।
प्राण प्रतिष्ठा समारोह में यूरोप के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, अफ्रीका और एशिया से बड़ी संख्या में संत, श्रद्धालु और गणमान्य अतिथि पहुंचे। 13 दिनों तक चलने वाले मंदिर महोत्सव में भारत, अमेरिका, कनाडा, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड समेत 40 से अधिक देशों से लोग शामिल हुए। इससे साफ है कि यह आयोजन केवल फ्रांस ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा से जुड़े लोगों के लिए बेहद खास रहा।
सुबह वैदिक मंत्रोच्चार के साथ वरिष्ठ संतों ने महापूजा विधि का शुभारंभ किया। इसके बाद मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई। श्री अक्षरपुरुषोत्तम महाराज, श्री घनश्याम महाराज, श्री राधा-कृष्ण भगवान, श्री सीता-राम भगवान के साथ श्री लक्ष्मण और श्री हनुमान जी, श्री पार्वती-शंकर भगवान के साथ श्री कार्तिकेय और श्री गणेश जी की मूर्तियों की प्रतिष्ठा की गई।
इसके अलावा श्री पद्मावती वेंकटेश्वर भगवान, श्री अय्यप्पा स्वामी जी, श्री नीलकंठवर्णी महाराज और गुरु परंपरा की मूर्तियों की भी विधिवत प्राण प्रतिष्ठा की गई। प्रतिष्ठा के बाद महंतस्वामी महाराज ने मंदिर में पहली प्रार्थना की। इस प्रार्थना में सभी धर्मों के बीच प्रेम और सद्भाव बना रहने, वैश्विक शांति स्थापित होने और पूरी मानवता के कल्याण की कामना की गई।
मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से पहले पेरिस में एक भव्य नगर यात्रा भी निकाली गई। इस दौरान भारतीय संस्कृति की कला, संगीत और आध्यात्मिक परंपराओं की शानदार झलक देखने को मिली। पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकारों ने विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं, जबकि 14 खूबसूरती से सजाए गए रथ इस यात्रा का प्रमुख आकर्षण रहे।
नगर यात्रा में हिंदू देवी-देवताओं की सुसज्जित मूर्तियों को विशेष मार्ग से शहर के प्रमुख स्थानों से होकर ले जाया गया। यह यात्रा विश्व प्रसिद्ध एफिल टावर और एकोल मिलिटेर से होते हुए प्लास द ला कॉनकॉर्ड पहुंचकर संपन्न हुई। इस दौरान पेरिस की सड़कों पर भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा की एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली।
पेरिस में इस भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प करीब 56 साल पहले लिया गया था। बताया जाता है कि वर्ष 1970 में गुरु योगीजी महाराज ने यहां मंदिर निर्माण का संकल्प किया था। इसके बाद प्रमुखस्वामी महाराज ने अपनी विदेश यात्राओं के दौरान इस संकल्प को आगे बढ़ाया और फ्रांस में सत्संग की नींव मजबूत की।
मंदिर निर्माण की दिशा में वर्ष 2021 में वरिष्ठ संतों की उपस्थिति में भूमि पूजन हुआ और वर्ष 2022 में शिलान्यास विधि संपन्न हुई। कई वर्षों की योजना, परंपरा और आधुनिक निर्माण तकनीक के बाद वर्ष 2026 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। अब प्राण प्रतिष्ठा के साथ यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए समर्पित कर दिया गया है।
इस मंदिर की वास्तुकला भी इसे खास बनाती है। करीब 5000 वर्गमीटर क्षेत्र में फैले इस परिसर के ऊपरी हिस्से में पारंपरिक मंदिर बनाया गया है, जबकि आधार में सांस्कृतिक केंद्र के रूप में सुंदर हवेली का निर्माण किया गया है। मंदिर के निर्माण में भारत के साथ इटली, ग्रीस और वियतनाम से प्राप्त संगमरमर तथा ग्वालियर के बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है।
मंदिर परिसर में पांच शिखर, 10 विशाल गुंबद, 20 नक्काशीदार स्तंभ, 120 गवाक्ष, 49 चरित्र शिल्प प्रतिमाएं और चार सुसज्जित छतरियां इसकी भव्यता को बढ़ाती हैं। यहां सभागृह, कक्षाएं, खेलकक्ष, प्रदर्शनी स्थल और कार्यालय जैसी सुविधाएं भी मौजूद हैं। खास बात यह है कि मंदिर की पारंपरिक भारतीय वास्तुकला के साथ आधुनिक फ्रांसीसी तकनीक का भी समावेश किया गया है।
फ्रांस की धरती पर बना यह पारंपरिक हिंदू मंदिर अब केवल पूजा और दर्शन का स्थान नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय संस्कृति, कला, वास्तुकला और आध्यात्मिक परंपराओं को दुनिया तक पहुंचाने का माध्यम भी बनेगा। प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान जिस तरह वैश्विक शांति, प्रेम, सद्भाव और मानव कल्याण का संदेश दिया गया, उससे यह मंदिर विभिन्न संस्कृतियों और समुदायों के बीच संवाद और एकता का प्रतीक बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


