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दिल्ली में लगातार गिर रहीं इमारतें! सत्य निकेतन हादसे के बाद 2 साल का डरावना रिकॉर्ड आया सामने

राजधानी दिल्ली में इमारतों के गिरने का सिलसिला एक बार फिर चिंता बढ़ाने वाला बन गया है। रविवार को आर.के. पुरम के सत्य निकेतन इलाके में एक इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। हादसे के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई और मौके पर मौजूद लोगों ने तुरंत पुलिस और प्रशासन को सूचना दी। शुरुआती जानकारी के मुताबिक हादसे में दो लोगों की मौत हुई है, जबकि कई अन्य लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका जताई गई।

घटना की जानकारी मिलते ही दमकल विभाग, NDRF, पुलिस और प्रशासन की टीमें मौके पर पहुंचीं। बचावकर्मियों ने मलबे को हटाने का काम शुरू किया और फंसे हुए लोगों की तलाश तेज कर दी गई। भारी मलबे के कारण राहत अभियान में कई चुनौतियां सामने आईं, लेकिन बचाव टीमें लगातार लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की कोशिश में जुटी रहीं।

बताया जा रहा है कि इस इमारत में दिल्ली विश्वविद्यालय के कई छात्र रह रहे थे। इमारत का इस्तेमाल रहने के लिए किया जा रहा था और हादसे के समय वहां कई लोगों के मौजूद होने की आशंका थी। यही वजह है कि घटना के बाद राहत और बचाव अभियान को बेहद गंभीरता से चलाया गया।

सत्य निकेतन में हुए इस हादसे ने दिल्ली में पुरानी और जर्जर इमारतों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। राजधानी में तेजी से बढ़ती आबादी और पुराने इलाकों में बनी कमजोर इमारतों के बीच ऐसे हादसे लगातार प्रशासन के सामने चुनौती बने हुए हैं।

पिछले दो वर्षों के दौरान दिल्ली में इमारत गिरने की कई बड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। कई हादसों में लोगों की जान गई, जबकि बड़ी संख्या में परिवारों को अपना घर और सामान गंवाना पड़ा। कुछ मामलों में पुरानी और जर्जर इमारतें हादसे की वजह बनीं, तो कुछ घटनाओं में निर्माण कार्य के दौरान ढांचे का हिस्सा गिर गया।

मार्च 2024 में शाहदरा के कबीर नगर में एक निर्माणाधीन इमारत का हिस्सा गिरने से लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद अगस्त 2024 में जहांगीरपुरी में एक तीन मंजिला इमारत का हिस्सा गिरने से भी जान-माल का नुकसान हुआ। इन घटनाओं ने राजधानी में निर्माण कार्यों की निगरानी और पुरानी इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।

साल 2025 में भी दिल्ली में कई बड़े हादसे हुए। मुस्तफाबाद में एक पुरानी चार मंजिला इमारत ढहने से एक ही परिवार के कई सदस्यों समेत बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद पहाड़गंज में निर्माणाधीन इमारत के बेसमेंट से जुड़ा हादसा हुआ, जिसमें लोगों की जान चली गई। वहीं वेलकम इलाके में जर्जर इमारत गिरने से भी कई लोगों की मौत हुई।

बारिश के मौसम में भी पुरानी इमारतों और कमजोर ढांचों के गिरने की घटनाएं सामने आती रही हैं। भारी बारिश के कारण जमीन में नमी बढ़ने और पुराने ढांचे पर दबाव पड़ने से ऐसी इमारतों का खतरा और बढ़ जाता है। दिल्ली जैसे घनी आबादी वाले शहर में अगर कोई इमारत अचानक गिरती है, तो आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हादसे होने के बाद ही जर्जर इमारतों की सुरक्षा को लेकर कार्रवाई क्यों तेज होती है। अगर किसी इमारत में दरारें हैं या उसका ढांचा कमजोर हो चुका है, तो समय रहते उसकी जांच और मरम्मत क्यों नहीं की जाती। साथ ही निर्माणाधीन इमारतों में सुरक्षा मानकों का कितना पालन हो रहा है, इसकी निगरानी भी जरूरी है।

सत्य निकेतन की घटना ने एक बार फिर राजधानी के सामने यही सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दिल्ली में रहने वाले लोगों के लिए पुरानी इमारतों की सुरक्षा पर्याप्त है। फिलहाल राहत और बचाव अभियान जारी है और हादसे की असली वजह जांच के बाद ही सामने आएगी। लेकिन यह घटना उन परिवारों के लिए चेतावनी जरूर है, जो वर्षों पुरानी और कमजोर इमारतों में रहने को मजबूर हैं।

दिल्ली में पिछले दो वर्षों के हादसों का सिलसिला बताता है कि इमारतों की सुरक्षा को लेकर केवल हादसे के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि संभावित रूप से खतरनाक इमारतों की समय रहते पहचान की जाए, निर्माण स्थलों पर सुरक्षा नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए और लोगों की जान जोखिम में डालने वाली लापरवाही पर प्रभावी कार्रवाई हो।

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