द लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित एक शोध ने भारत के ग्रामीण इलाकों में सतत विकास लक्ष्यों यानी SDG की स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखी है। अध्ययन के मुताबिक 2021 तक भारत का कोई भी गांव कई प्रमुख SDG लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सका था। इनमें स्वास्थ्य बीमा कवरेज, बुनियादी सेवाओं तक पहुंच, महिलाओं के बैंक खाते का स्वामित्व और इंटरनेट इस्तेमाल जैसे लक्ष्य शामिल हैं। हालांकि, इसी अध्ययन में एक ऐसा क्षेत्र भी सामने आया जहां ग्रामीण भारत का प्रदर्शन बेहद बेहतर रहा।
शोधकर्ताओं के मुताबिक करीब 99.9 प्रतिशत गांवों ने 10 से 14 साल की किशोरियों में गर्भधारण रोकने से जुड़े लक्ष्य को हासिल कर लिया था। यानी इस विशेष संकेतक में भारत के लगभग सभी गांव निर्धारित लक्ष्य तक पहुंच चुके थे। शोधकर्ताओं ने इसे ग्रामीण स्तर पर सामाजिक और स्वास्थ्य संकेतकों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर दर्ज किया है।
इस अध्ययन को अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय के टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, मुंबई के धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल और अन्य संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया। इसमें भारत के करीब छह लाख गांवों में स्वास्थ्य और सामाजिक परिस्थितियों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के लिए मुख्य रूप से राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी NFHS 2019-21 और 2011 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया।
संयुक्त राष्ट्र ने साल 2015 में 17 सतत विकास लक्ष्यों को अपनाया था। इनका मुख्य उद्देश्य 2030 तक गरीबी खत्म करना, पर्यावरण की रक्षा करना और दुनिया के सभी लोगों के लिए शांति, समृद्धि और बेहतर जीवन सुनिश्चित करना है। लेकिन नए अध्ययन का कहना है कि राष्ट्रीय या जिला स्तर पर इन लक्ष्यों की प्रगति देखने से गांवों के बीच मौजूद असमानताएं छिप सकती हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि गांव सेवा वितरण और स्थानीय प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण इकाइयों में शामिल हैं। इसके बावजूद ग्रामीण स्तर पर पर्याप्त और नियमित आंकड़ों की उपलब्धता एक चुनौती बनी हुई है। इसी वजह से एक ही जिले में स्थित अलग-अलग गांवों की वास्तविक स्थिति को समझना मुश्किल हो सकता है।
अध्ययन में ग्रामीण भारत में बहुआयामी गरीबी की स्थिति में भी काफी बड़ा अंतर पाया गया। अलग-अलग गांवों में बहुआयामी गरीबी का अनुमान 0.14 प्रतिशत से लेकर 78.82 प्रतिशत तक रहा। यानी कुछ गांवों में गरीबी का स्तर बेहद कम था, जबकि कुछ गांवों में बड़ी आबादी कई तरह की बुनियादी सुविधाओं से वंचित थी।
स्वास्थ्य बीमा के मामले में भी गांवों के बीच भारी अंतर देखने को मिला। पुरुषों में स्वास्थ्य बीमा कवरेज 1.67 प्रतिशत से लेकर 94 प्रतिशत तक पाया गया। इसी तरह इंटरनेट उपयोग का स्तर भी अलग-अलग गांवों में काफी अलग था और यह 6.58 प्रतिशत से लेकर 92.93 प्रतिशत तक रहा। इससे साफ होता है कि डिजिटल सुविधाओं और स्वास्थ्य सुरक्षा तक पहुंच में ग्रामीण भारत के भीतर काफी असमानता मौजूद है।
अध्ययन में कुछ ऐसे क्षेत्र भी सामने आए जहां बड़ी संख्या में गांवों ने संबंधित लक्ष्य हासिल किया था। महिलाओं में तंबाकू सेवन से जुड़े लक्ष्य को करीब 69.1 प्रतिशत गांवों ने हासिल किया। बहुआयामी गरीबी से जुड़े लक्ष्य को 33.6 प्रतिशत और बेहतर जल सुविधा से जुड़े लक्ष्य को 32.4 प्रतिशत गांवों ने हासिल किया।
वहीं दूसरी तरफ स्वास्थ्य बीमा कवरेज, बुनियादी सेवाओं तक पहुंच, मोबाइल फोन का स्वामित्व, खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन, पूर्ण टीकाकरण, इंटरनेट उपयोग और साथी द्वारा हिंसा जैसे संकेतकों में किसी भी गांव ने अध्ययन के निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं किया था। ये आंकड़े ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा को लेकर बड़ी चुनौतियों की ओर इशारा करते हैं।
शोधकर्ताओं ने खास तौर पर एक जिले के भीतर मौजूद अंतर पर भी जोर दिया है। उनका कहना है कि केवल जिला स्तर पर औसत आंकड़ों के आधार पर नीति बनाने से गांवों की वास्तविक समस्याएं सामने नहीं आ सकतीं। एक ही जिले में कुछ गांव बेहतर स्थिति में हो सकते हैं, जबकि दूसरे गांवों को स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल सुविधाओं और बुनियादी सेवाओं के लिए ज्यादा मदद की जरूरत हो सकती है।
अध्ययन के मुताबिक 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ग्रामीण स्तर पर सुधार की गति को काफी तेज करना होगा। सिर्फ जिला स्तर पर एक जैसी रणनीति लागू करना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि गांवों की स्थानीय परिस्थितियों और उनकी अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जाएं।
कुल मिलाकर Lancet में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि भारत ने कुछ ग्रामीण संकेतकों में उल्लेखनीय प्रगति जरूर की है, लेकिन स्वास्थ्य बीमा, बुनियादी सेवाओं, स्वच्छ ईंधन, इंटरनेट, टीकाकरण और महिलाओं की सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में अभी बड़ी चुनौती मौजूद है। 2030 की समयसीमा को देखते हुए अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन असमानताओं को कम करने और गांवों तक विकास का लाभ तेजी से पहुंचाने के लिए स्थानीय स्तर पर कितनी प्रभावी रणनीति अपनाई जाती है।


