श्रीलंका और चीन की बढ़ती नजदीकी ने हिंद महासागर की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि भारत का करीबी पड़ोसी श्रीलंका धीरे-धीरे चीन के प्रभाव में आता चला गया? कहानी सिर्फ कर्ज की नहीं है, बल्कि रणनीतिक हितों, बंदरगाहों और हिंद महासागर में बढ़ते चीनी प्रभाव की भी है। इसे समझने के लिए हमें श्रीलंका और भारत के पुराने रिश्तों से शुरुआत करनी होगी।
भारत और श्रीलंका के संबंध सदियों पुराने हैं। तमिल समुदाय के कारण दोनों देशों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ता बेहद गहरा रहा है। आधुनिक दौर में श्रीलंका की तमिल समस्या ने दोनों देशों के संबंधों को और संवेदनशील बनाया। राजीव गांधी सरकार ने 1987 में श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजी थी। बाद में लिट्टे से जुड़े लोगों ने राजीव गांधी की हत्या कर दी। इन घटनाओं के बावजूद भारत और श्रीलंका के रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं हुए और भारत लंबे समय से श्रीलंका की आर्थिक और मानवीय मदद करता रहा है।
लेकिन इसी दौरान चीन ने श्रीलंका में अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी। 2005 में महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति बने और उनका झुकाव चीन की तरफ बढ़ता गया। राजपक्षे अपने गृह क्षेत्र हंबनटोटा में एक बड़ा बंदरगाह बनाना चाहते थे। जब भारत की ओर से अपेक्षित रुचि नहीं मिली, तो श्रीलंका ने चीन का रुख किया। चीन की सरकारी और सरकारी-समर्थित संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर कर्ज देकर परियोजनाओं को आगे बढ़ाया।
हंबनटोटा बंदरगाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण बना। चीन के कर्ज से तैयार हुए इस बंदरगाह से श्रीलंका को उम्मीद थी कि व्यापार और राजस्व बढ़ेगा। लेकिन परियोजना उम्मीद के मुताबिक आर्थिक फायदा नहीं दे सकी और श्रीलंका पर कर्ज का दबाव बढ़ता गया। आखिरकार 2017 में श्रीलंका ने हंबनटोटा पोर्ट का संचालन चीन की कंपनी को 99 साल की लीज पर सौंप दिया। हालांकि इसे अक्सर ‘चीन को बंदरगाह बेच देना’ कहा जाता है, लेकिन तकनीकी रूप से यह स्वामित्व हस्तांतरण नहीं बल्कि लंबी अवधि की लीज और संचालन व्यवस्था थी।
यहीं से चीन के रणनीतिक प्रभाव को लेकर भारत की चिंता बढ़ी। श्रीलंका हिंद महासागर के महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों के बिल्कुल करीब स्थित है। चीन के लिए यह इलाका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके व्यापारिक जहाज इसी समुद्री क्षेत्र से गुजरते हैं। चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत श्रीलंका में कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू हुए। आलोचकों का आरोप रहा कि इन परियोजनाओं ने श्रीलंका को चीन पर आर्थिक रूप से ज्यादा निर्भर बनाया।
इसके बाद आया कोलंबो पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट। 2014 से 2019 के बीच चीन की कंपनी चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन कंपनी ने कोलंबो के पास समुद्र से जमीन तैयार करने का बड़ा काम किया। करीब 1.4 अरब डॉलर के निवेश वाले इस प्रोजेक्ट में समुद्र से लगभग 269 हेक्टेयर जमीन तैयार की गई। समझौते के तहत चीनी कंपनी को लगभग 116 हेक्टेयर जमीन का अधिकार मिला, जिसमें बड़ी मात्रा 99 साल की लीज व्यवस्था से जुड़ी थी।
कोलंबो पोर्ट सिटी को लेकर श्रीलंका में राजनीतिक और कानूनी बहस भी हुई। बाद में इसके लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र की व्यवस्था बनाई गई, जिसके तहत निवेशकों को कई तरह की सुविधाएं और अलग प्रशासनिक व्यवस्था दी गई। विपक्ष और आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या इससे श्रीलंका के सामान्य प्रशासनिक और कानूनी ढांचे से अलग एक विशेष क्षेत्र तैयार हो रहा है।
हालांकि हंबनटोटा और कोलंबो पोर्ट सिटी को सीधे-सीधे ‘चीनी क्षेत्र’ कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। श्रीलंका की संप्रभुता औपचारिक रूप से श्रीलंका के पास ही है। असली चिंता यह है कि लंबी अवधि की लीज, बड़े चीनी निवेश और रणनीतिक समुद्री परियोजनाओं के कारण हिंद महासागर में चीन का आर्थिक और संभावित रणनीतिक प्रभाव कितना बढ़ सकता है।
यही वजह है कि भारत श्रीलंका में चीन की बढ़ती मौजूदगी को बेहद करीब से देखता है। हिंद महासागर में भारत की भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के बीच श्रीलंका किसी सामान्य पड़ोसी देश से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए हंबनटोटा से लेकर कोलंबो पोर्ट सिटी तक की कहानी सिर्फ श्रीलंका और चीन के रिश्तों की कहानी नहीं, बल्कि हिंद महासागर में बदलते शक्ति संतुलन की कहानी भी है।


