केपीएमजी इंडिया के मुख्य कार्यपालक अधिकारी येजदी नागपोरवाला ने वैश्विक स्तर पर कृत्रिम मेधा यानी एआई क्षेत्र की कुछ बड़ी कंपनियों के मूल्यांकन को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि कुछ कंपनियों को जिस स्तर का मूल्यांकन मिल रहा है, उसे उनके मौजूदा राजस्व के आधार पर सही ठहराना मुश्किल है। उनके बयान ने वैश्विक एआई उद्योग में कंपनियों के मूल्यांकन और उनके कारोबारी मॉडल को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है।
नागपोरवाला के अनुसार, कुछ बड़ी एआई कंपनियों के राजस्व और उनके बाजार मूल्यांकन के बीच काफी बड़ा अंतर दिखाई देता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी कंपनी का राजस्व 50 अरब डॉलर से कम है, तो उसका मूल्यांकन 1,000 अरब डॉलर या उससे अधिक किस आधार पर किया जा सकता है। उनका कहना था कि केवल मौजूदा राजस्व मॉडल को देखते हुए इस स्तर के मूल्यांकन को उचित ठहराना आसान नहीं है।
एआई क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान निवेश और कंपनियों के मूल्यांकन में तेजी देखने को मिली है। बड़े स्तर पर निवेश के कारण कई एआई कंपनियों की बाजार में कीमत और भविष्य की संभावनाओं को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं। हालांकि, नागपोरवाला का कहना है कि किसी कंपनी का मौजूदा राजस्व और उसका मूल्यांकन यदि बहुत अलग स्तर पर हो तो उस अंतर को समझने के लिए भविष्य की कमाई और कारोबारी क्षमता जैसे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।
भारत की एआई क्षमता को लेकर भी नागपोरवाला ने सकारात्मक संभावना जताई। उनसे जब पूछा गया कि क्या भारत एआई की दौड़ में पीछे रह गया है, तो उन्होंने कहा कि कुछ मायनों में ऐसा कहा जा सकता है, लेकिन कुछ मायनों में नहीं। उनके अनुसार भारत के पास इस अंतर को तेजी से पाटने और आगे निकलने का अच्छा अवसर मौजूद है।
नागपोरवाला ने कहा कि भारत को आने वाले समय में अपना खुद का लार्ज लैंग्वेज मॉडल यानी एलएलएम विकसित करना होगा। उन्होंने भरोसा जताया कि भारत ऐसा मॉडल विकसित करने की क्षमता रखता है। उनका कहना है कि देश का प्रौद्योगिकी परिवेश और यहां मौजूद वैश्विक क्षमता केंद्र यानी जीसीसी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारत में पहले से ही बड़ी संख्या में तकनीकी विशेषज्ञ, सॉफ्टवेयर इंजीनियर और शोधकर्ता वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ काम कर रहे हैं। देश में मौजूद वैश्विक क्षमता केंद्र भी कृत्रिम मेधा, आंकड़ा विज्ञान, सॉफ्टवेयर और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। नागपोरवाला के मुताबिक यही तकनीकी आधार भारत को अपना एआई पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने में मदद कर सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत के लिए केवल दूसरे देशों द्वारा विकसित एआई तकनीकों का इस्तेमाल करना ही पर्याप्त नहीं होगा। आने वाले समय में देश को अपने मॉडल, तकनीक और क्षमता विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। अपना लार्ज लैंग्वेज मॉडल विकसित करना इसी व्यापक लक्ष्य का हिस्सा हो सकता है।
वैश्विक एआई उद्योग में इस समय कंपनियों के मूल्यांकन को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। निवेशक एआई कंपनियों की भविष्य की कमाई की संभावनाओं को ध्यान में रखकर निवेश कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ मौजूदा राजस्व और ऊंचे मूल्यांकन के बीच अंतर को लेकर सवाल उठा रहे हैं। नागपोरवाला का बयान इसी बहस के बीच आया है।
भारत के लिए एआई क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर कई स्तरों पर मौजूद है। देश के पास बड़ी तकनीकी प्रतिभा, तेजी से बढ़ता डिजिटल ढांचा और वैश्विक कंपनियों की बड़ी मौजूदगी है। इसके साथ ही भारतीय कंपनियां और शोध संस्थान एआई आधारित सेवाओं और उत्पादों पर भी काम कर रहे हैं।
हालांकि, अपना बड़ा एआई मॉडल विकसित करने के लिए भारी कंप्यूटिंग क्षमता, उच्च गुणवत्ता वाले आंकड़े, विशेषज्ञ प्रतिभा और बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। ऐसे में भारत के सामने अवसर के साथ कई तकनीकी और आर्थिक चुनौतियां भी मौजूद हैं।
फिलहाल नागपोरवाला के बयान ने दो महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने रखा है। पहला, वैश्विक एआई कंपनियों के बहुत ऊंचे मूल्यांकन को उनके वास्तविक कारोबारी प्रदर्शन के संदर्भ में कैसे देखा जाए और दूसरा, भारत एआई के वैश्विक विकास में अपनी भूमिका को किस तरह मजबूत कर सकता है। उनके अनुसार भारत शुरुआती दौर में कुछ क्षेत्रों में पीछे रहा हो सकता है, लेकिन तकनीकी क्षमता और मौजूदा पारिस्थितिकी तंत्र के आधार पर देश के पास अंतर को पाटने का अवसर मौजूद है।


