दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें रखीं। सुनवाई के दौरान मतदाताओं को जारी किए जा रहे नोटिस और उनमें इस्तेमाल किए गए ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी तार्किक विसंगति शब्द को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मतदाता को किसी विसंगति के आधार पर नोटिस जारी किया जा रहा है, तो नोटिस में उस विसंगति का स्पष्ट कारण बताया जाना चाहिए। संबंधित व्यक्ति को यह समझ आना चाहिए कि उसके रिकॉर्ड में किस तरह की समस्या पाई गई है और उससे किस जानकारी या दस्तावेज की जरूरत है।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने मामले को गंभीर और चौंकाने वाला बताया। उन्होंने अदालत के सामने कहा कि जो कुछ हुआ है, उसे गंभीरता से देखने की जरूरत है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि आखिर मतदाताओं को किस आधार पर नोटिस जारी किए जा रहे हैं और पूरी प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ रही है।
मामले की सुनवाई के दौरान ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ शब्द भी चर्चा के केंद्र में रहा। अदालत के सामने यह सवाल आया कि आम मतदाता को इस तकनीकी शब्द का अर्थ कैसे समझ आएगा। कोर्ट ने संकेत दिया कि नोटिस की भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसे संबंधित व्यक्ति आसानी से समझ सके और वह अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए आवश्यक कदम उठा सके।
SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची में दर्ज जानकारी की जांच की जाती है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची से संबंधित रिकॉर्ड को सत्यापित करना और आवश्यक सुधार करना होता है। हालांकि दिल्ली में जारी किए गए कुछ नोटिसों को लेकर प्रक्रिया और उनके आधार पर सवाल उठाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से इस मामले में जवाब मांगा है। अब आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नोटिस जारी करने के लिए कौन से मानदंड अपनाए गए हैं और संबंधित मतदाताओं को नोटिस में विसंगति की जानकारी किस तरह दी जा रही है।
सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी व्यक्ति को नोटिस देने की स्थिति में उसे पर्याप्त और स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। केवल तकनीकी शब्दों का इस्तेमाल करने के बजाय नोटिस में वास्तविक समस्या या विसंगति का उल्लेख होना जरूरी है, ताकि व्यक्ति अपनी स्थिति समझ सके।
इस मामले में अब चुनाव आयोग के जवाब पर नजर रहेगी। आयोग की ओर से प्रक्रिया और नोटिस जारी करने के आधार को स्पष्ट किए जाने के बाद आगे की सुनवाई में अदालत इस मामले पर संबंधित पक्षों की दलीलें सुनेगी।
दिल्ली SIR से जुड़ा यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची सीधे चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी होती है। ऐसे में मतदाता रिकॉर्ड की जांच के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रिया, नोटिस की भाषा और संबंधित नागरिक को दी जाने वाली जानकारी को लेकर उठे सवालों पर अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई आगे बढ़ेगी।


