महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को 17 साल पुराने एक मामले में कल्याण की मजिस्ट्रेट अदालत ने बरी कर दिया है। मामला 2009 में दर्ज हुआ था और इसमें मानहानि तथा चुनाव कानून के उल्लंघन से जुड़े आरोप लगाए गए थे। खास बात यह है कि जिस समय यह मामला सामने आया था, उस वक्त एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे एक ही राजनीतिक दल में थे।
संयुक्त सिविल जज और न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी संतोष ए. आंगे ने 23 सितंबर 2026 को मामले में अपना फैसला सुनाया। फैसले की प्रति गुरुवार को उपलब्ध हुई। अदालत के इस फैसले के साथ करीब 17 वर्षों से चल रही कानूनी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हुआ।
यह मामला वर्ष 2009 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से जुड़ा बताया जा रहा है। उस समय चुनावी प्रक्रिया के दौरान दोनों नेताओं के खिलाफ मानहानि और चुनाव संबंधी कानूनों के उल्लंघन के आरोप लगाए गए थे। शिकायत में लगाए गए आरोपों को लेकर लंबे समय तक कानूनी कार्यवाही चलती रही और आखिरकार कल्याण की अदालत ने दोनों नेताओं को आरोपों से बरी कर दिया।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उस समय महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना एक अलग राजनीतिक स्थिति में थी और उद्धव ठाकरे तथा एकनाथ शिंदे उसी संगठन का हिस्सा थे। बाद के वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े बदलाव हुए और दोनों नेताओं की राजनीतिक राहें अलग हो गईं।
उद्धव ठाकरे बाद में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने और शिवसेना के नेतृत्व को लेकर हुए विवाद के बाद पार्टी दो प्रमुख धड़ों में बंट गई। दूसरी ओर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में अलग गुट ने महाराष्ट्र में सरकार बनाई और शिंदे राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे। वर्तमान में वह महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री हैं। हालांकि, जिस मामले में अदालत ने फैसला सुनाया है, वह इन राजनीतिक घटनाक्रमों से काफी पहले का है।
अदालत में 2009 के मामले से जुड़े आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों पर सुनवाई हुई। लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत ने दोनों नेताओं को बरी कर दिया। इसका मतलब है कि इस मामले में अदालत ने अभियोजन पक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों के आधार पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया।
17 साल पुराने इस मामले का फैसला ऐसे समय आया है जब महाराष्ट्र की राजनीति में एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे दोनों अलग-अलग राजनीतिक खेमों का नेतृत्व कर रहे हैं। इसलिए अदालत के फैसले के बाद इस पुराने मामले की चर्चा एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी दोनों संदर्भों में होने लगी है।
इस मामले की शुरुआत उस दौर में हुई थी जब महाराष्ट्र में चुनावी राजनीति के दौरान नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप आम थे। शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोपों को लेकर न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और मामला मजिस्ट्रेट अदालत तक पहुंचा। इतने लंबे समय के बाद अब अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए दोनों नेताओं को बरी कर दिया है।
फैसले की तारीख 23 सितंबर 2026 है और इसकी प्रति अगले दिन उपलब्ध हुई। अदालत के निर्णय के बाद इस मामले में दोनों नेताओं की कानूनी स्थिति स्पष्ट हो गई है। हालांकि, किसी भी न्यायिक फैसले के आगे की प्रक्रिया संबंधित कानूनी प्रावधानों और संभावित अपील पर निर्भर करती है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2009 से 2026 के बीच महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। जिस समय मामला दर्ज हुआ था, उस समय दोनों नेता एक ही राजनीतिक संगठन में थे, जबकि आज दोनों अलग-अलग राजनीतिक धड़ों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में करीब 17 साल पुराने इस मामले का फैसला महाराष्ट्र के बदलते राजनीतिक इतिहास की एक झलक भी पेश करता है।


