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भारत का बड़ा धमाका! यूरोप को गोला-बारूद सप्लाई करने में बना तीसरा सबसे बड़ा खिलाड़ी, रक्षा निर्यात ने तोड़े रिकॉर्ड

जिस भारत को कभी अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था, आज वही भारत दुनिया के रक्षा बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। भारतीय रक्षा उद्योग की बढ़ती ताकत और गोला-बारूद के निर्यात को लेकर एक बड़ा दावा सामने आया है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के अनुसार, भारत यूरोप को हथियारों का निर्यात करने वाले प्रमुख देशों में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। खास तौर पर तोपों के गोलों की बढ़ती मांग और देश में मजबूत होते रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को इस उपलब्धि की प्रमुख वजह बताया जा रहा है।

भारत की इस प्रगति के बीच देश का कुल रक्षा निर्यात भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इसके साथ ही भारत अब 80 से अधिक देशों को सैन्य साजो-सामान और रक्षा उत्पादों का निर्यात कर रहा है। यह बदलाव भारतीय रक्षा उद्योग की उत्पादन क्षमता, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती भागीदारी को दर्शाता है।

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने केपीएमजी अग्रसर भारत मंच के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वैश्विक परिस्थितियों और भारत के रक्षा निर्यात पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चल रहे संघर्ष और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण सैन्य उपकरणों की मांग बढ़ रही है। उनके मुताबिक, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सक्रिय संघर्षों की संख्या अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने की स्थिति में है। ऐसे माहौल में कई देश अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए सैन्य साजो-सामान और गोला-बारूद की उपलब्धता बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं।

यूरोप में भी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में कई कदम उठाए जा रहे हैं। इसी संदर्भ में रीआर्म यूरोप अभियान और सैन्य उत्पादन बढ़ाने की कोशिशों का उल्लेख किया जा रहा है। यूरोपीय देशों की बढ़ती जरूरतों से रक्षा उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय बाजार में नए अवसर पैदा हुए हैं। भारत के लिए यह अवसर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में गोला-बारूद और अन्य सैन्य उपकरणों का उत्पादन करने की क्षमता लगातार विकसित हुई है।

भारत के रक्षा निर्यात में पारंपरिक गोला-बारूद की अहम भूमिका बताई जाती है। इनमें तोपों में इस्तेमाल होने वाले 155 मिलीमीटर के गोले भी शामिल हैं। आधुनिक तोपखाने में इन गोलों का इस्तेमाल किया जाता है और विभिन्न देशों की सैन्य जरूरतों के कारण इनकी मांग बनी रहती है। भारत की घरेलू विनिर्माण क्षमता मजबूत होने से देश अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन उत्पादों की आपूर्ति करने की स्थिति में पहुंचा है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रक्षा निर्यात में वृद्धि केवल एक उत्पाद की मांग पर निर्भर नहीं करती। इसके पीछे उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति, कीमत, अंतरराष्ट्रीय समझौते और खरीदार देशों की आवश्यकताएं जैसे कई कारक काम करते हैं। भारत के लिए निर्यात बढ़ाने के साथ-साथ अपने उत्पादों की विश्वसनीयता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।

भारत लंबे समय तक अपनी रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी हथियारों और सैन्य उपकरणों का बड़ा खरीदार रहा है। लेकिन बीते वर्षों में घरेलू रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने और स्वदेशी निर्माण क्षमता विकसित करने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य न केवल देश की सैन्य जरूरतों को पूरा करना है, बल्कि भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना भी है। रक्षा निर्यात में बढ़ोतरी इसी व्यापक बदलाव का एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा सकती है।

38,424 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात और 80 से अधिक देशों तक भारतीय रक्षा उत्पादों की पहुंच देश के रक्षा उद्योग के विस्तार को दिखाती है। हालांकि, यूरोप में तीसरे सबसे बड़े हथियार निर्यातक होने के दावे को समझते समय यह जानना भी जरूरी है कि यह रैंकिंग किस अवधि, किस श्रेणी के हथियारों और किस आधार पर तय की गई है। कुल रक्षा निर्यात और केवल यूरोपीय बाजार में हथियारों की आपूर्ति अलग-अलग आंकड़े हैं, इसलिए दोनों को एक ही अर्थ में नहीं देखना चाहिए।

फिलहाल, भारत के रक्षा निर्यात में बढ़ोतरी देश के लिए आर्थिक और रणनीतिक, दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि भारतीय रक्षा उद्योग उत्पादन, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय मांग के बीच कितना बेहतर संतुलन बना पाता है। अगर घरेलू विनिर्माण क्षमता इसी तरह मजबूत होती रही, तो भारत वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी हिस्सेदारी और बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

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