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दिल्ली में सरकारी स्कूलों की किताबों पर सियासी घमासान! AAP ने उठाए सवाल, शिक्षा मंत्री आशीष सूद का पलटवार

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को मुफ्त बांटी जाने वाली किताबों को लेकर आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। किताबों की खरीद प्रक्रिया, छपाई की गुणवत्ता और संभावित कमीशन को लेकर आम आदमी पार्टी ने रेखा गुप्ता सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। वहीं, दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने इन आरोपों को खारिज करते हुए आम आदमी पार्टी पर पलटवार किया है। इस विवाद ने दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था और सरकारी खरीद प्रक्रिया को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।

आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिल्ली सरकार के स्कूलों में बांटी जाने वाली किताबों की छपाई और खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि किताबों की छपाई में लगभग 40 प्रतिशत तक कमीशन होने की आशंका है। उनके इस आरोप के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। हालांकि, यह आरोप है और इसकी पुष्टि के लिए संबंधित दस्तावेजों, निविदा की शर्तों तथा खरीद प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच जरूरी होगी।

सौरभ भारद्वाज ने बाजार में उपलब्ध राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी की किताबों की तुलना दिल्ली सरकार के टेंडर के तहत छापी गई किताबों से करने की बात कही। उन्होंने कागज की गुणवत्ता, किताबों के आकार और छपाई को लेकर सवाल खड़े किए। आम आदमी पार्टी का कहना है कि इन पहलुओं की जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सरकारी धन का इस्तेमाल किस तरह किया गया और विद्यार्थियों को मिलने वाली किताबों की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं।

इस विवाद का संबंध केवल किताबों की छपाई तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे मुद्दे भी इससे जुड़े हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मुफ्त किताबें उपलब्ध कराना शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में किताबों की गुणवत्ता, उनकी समय पर उपलब्धता और खरीद पर खर्च होने वाली राशि को लेकर उठने वाले सवालों का स्पष्ट जवाब मिलना जरूरी है।

दूसरी ओर, दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने आम आदमी पार्टी के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि वह शिक्षा विभाग पर लगाए गए झूठे आरोपों का जवाब देने आए हैं। उन्होंने आम आदमी पार्टी के नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों ने अपने दस साल के शासन में केवल घोटाले किए हैं, उन्हें हर जगह घोटाला ही नजर आता है। उनके इस बयान से स्पष्ट है कि भाजपा सरकार ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक हमला मानते हुए उनका विरोध किया है।

शिक्षा मंत्री के पलटवार के बाद अब यह मामला आरोप और जवाबी आरोपों के बीच पहुंच गया है। एक ओर आम आदमी पार्टी किताबों की छपाई और खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, तो दूसरी ओर भाजपा सरकार इन आरोपों को गलत बता रही है। हालांकि, इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि दोनों पक्ष अपने दावों के समर्थन में कौन-से तथ्य और दस्तावेज सामने रखते हैं।

इस मामले में वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए टेंडर की शर्तों, किताबों की छपाई की लागत, कागज की निर्धारित गुणवत्ता, आपूर्ति से संबंधित रिकॉर्ड और भुगतान के विवरण की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि किसी प्रकार की अनियमितता के आरोप लगाए गए हैं, तो उनका मूल्यांकन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल राजनीतिक बयानबाजी से किसी आरोप को सही या गलत साबित नहीं किया जा सकता।

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है, क्योंकि मुफ्त किताबें विद्यार्थियों की पढ़ाई में सीधी भूमिका निभाती हैं। किताबों की गुणवत्ता और समय पर वितरण सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। साथ ही, सार्वजनिक धन से होने वाली खरीद प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका दूर हो सके।

फिलहाल, सरकारी स्कूलों की किताबों को लेकर आम आदमी पार्टी और भाजपा आमने-सामने हैं। सौरभ भारद्वाज ने खरीद और छपाई पर सवाल उठाए हैं, जबकि शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने आरोपों को खारिज करते हुए विपक्ष पर निशाना साधा है। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार इन सवालों पर क्या विस्तृत जानकारी देती है और क्या विवाद से जुड़े दावों की जांच के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाता है।

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