मार्च के चुनाव में जिस बालेन शाह ने नेपाल की पुरानी राजनीति को बड़ा झटका देते हुए चार बार प्रधानमंत्री रह चुके केपी शर्मा ओली को उनके ही गढ़ झापा में मात दी थी, आज उनके प्रधानमंत्री बनने के करीब 150 दिन बाद वही चमक फीकी पड़ती नजर आ रही है। सवाल उठ रहा है कि जिस Gen Z लहर ने बालेन शाह को सत्ता तक पहुंचाया था, क्या अब उसी लहर का असर कम होने लगा है?
27 मार्च को नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले बालेंद्र ‘बालेन’ शाह को अब करीब 150 दिन पूरे हो चुके हैं। चुनाव के दौरान उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनी थी, जो नेपाल की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था और दशकों से सत्ता पर काबिज नेताओं को चुनौती देने की क्षमता रखता है।
बालेन शाह की राजनीति का सफर भी बेहद अलग रहा है। कभी अंडरग्राउंड रैपर के तौर पर पहचान बनाने वाले बालेन पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर रहे और बाद में काठमांडू के मेयर बने। मेयर के तौर पर उनके काम करने के अंदाज ने उन्हें युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय बनाया। यही लोकप्रियता आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति में उनके लिए बड़ी ताकत बन गई।
नेपाल के मार्च में हुए चुनाव में बालेन शाह ने अपनी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी यानी RSP को बहुमत दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इतना ही नहीं, उन्होंने चार बार प्रधानमंत्री रह चुके केपी शर्मा ओली को उनके राजनीतिक गढ़ झापा में भी हरा दिया। इस जीत ने नेपाल की राजनीति में एक बड़ा संदेश दिया कि युवा मतदाता अब पारंपरिक राजनीतिक चेहरों से आगे बढ़कर नए विकल्पों को मौका देने के लिए तैयार हैं।
बालेन शाह की जीत को Gen Z Wave से भी जोड़कर देखा गया। यह ऐसी युवा लहर थी जिसने नेपाल की सत्ता और राजनीतिक व्यवस्था को सीधे प्रभावित किया। युवाओं के बीच बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अस्थिरता और पुराने नेताओं को लेकर नाराजगी ने बालेन शाह के पक्ष में माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
लेकिन प्रधानमंत्री बनने के 150 दिनों के भीतर तस्वीर पहले जैसी नहीं दिख रही है। जिस बदलाव की उम्मीद युवाओं ने बालेन शाह से की थी, अब उसके सामने कई चुनौतियां खड़ी होती दिखाई दे रही हैं। सत्ता में आने के बाद किसी भी नेता के सामने सिर्फ वादों को दोहराने की नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर लागू करने की चुनौती होती है।
यही वजह है कि अब बालेन शाह की सरकार को लेकर सवाल उठने लगे हैं। क्या वह उस राजनीतिक बदलाव को वास्तव में आगे बढ़ा पाएंगे, जिसकी उम्मीद उनकी जीत के समय की गई थी? क्या Gen Z की उम्मीदें सरकार के कामकाज से पूरी हो रही हैं या फिर शुरुआती उत्साह धीरे-धीरे कम हो रहा है?
बालेन शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी चुनावी लोकप्रियता को प्रभावी शासन में बदलने की है। सड़क से लेकर संसद और सोशल मीडिया से लेकर जनता के बीच तक उनकी राजनीति का प्रभाव काफी मजबूत रहा है, लेकिन सरकार चलाने की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा जटिल होती है।
अब देखना होगा कि आने वाले महीनों में बालेन शाह अपनी सरकार की दिशा कैसे तय करते हैं। क्या वह नेपाल की पुरानी राजनीति को पूरी तरह बदलने में सफल होंगे या फिर 150 दिनों में ही उनकी Gen Z वाली चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ जाएगी? यही सवाल अब नेपाल की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।


