अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा तनाव अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति को लेकर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। एक तरफ ट्रंप कथित तौर पर ईरान के साथ चल रहे युद्ध को खत्म घोषित करने पर विचार कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अमेरिका सच में युद्ध खत्म करने की तैयारी कर रहा है, या फिर इसके पीछे कोई बड़ी रणनीतिक चाल है?
‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के साथ जारी संघर्ष के करीब सात महीने बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप निजी तौर पर यह घोषणा करने पर विचार कर रहे हैं कि युद्ध अब खत्म हो चुका है। अगर ऐसा होता है तो यह अमेरिका की विदेश नीति में एक बड़ा बदलाव माना जाएगा। लेकिन इसी बीच पेंटागन की ओर से पश्चिम एशिया में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती बढ़ाई जा रही है। यानी राजनीतिक स्तर पर युद्ध खत्म करने की बात और सैन्य स्तर पर तैयारी बढ़ाने की कार्रवाई एक-दूसरे से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है।
इसी विरोधाभास ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मंगलवार को अमेरिका और ईरान के बीच हमलों का एक नया दौर शुरू हुआ। इसके बाद अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी CENTCOM ने बुधवार को दावा किया कि अमेरिकी सेना ने ईरान के अंदर कई ठिकानों को निशाना बनाया है। अमेरिका की इस कार्रवाई के जवाब में ईरान ने भी खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका से जुड़ी कई सुविधाओं पर हमले किए। इससे एक बार फिर पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ता दिखाई दिया।
ईरानी अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिका के हालिया हमलों में 18 लोगों की मौत हुई है, जबकि 142 लोग घायल हुए हैं। इन आंकड़ों ने संघर्ष की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। हालांकि, अमेरिका और ईरान की ओर से किए जा रहे दावों और हमलों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह टकराव किस दिशा में जा रहा है?
अगर ट्रंप वास्तव में युद्ध खत्म करने की घोषणा करने पर विचार कर रहे हैं, तो फिर पेंटागन सैनिकों की संख्या क्यों बढ़ा रहा है? क्या अमेरिका किसी संभावित ईरानी जवाबी कार्रवाई के लिए खुद को तैयार कर रहा है? या फिर ट्रंप युद्ध को औपचारिक रूप से खत्म घोषित करके भी पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य ताकत बनाए रखना चाहते हैं?
दरअसल, किसी युद्ध को खत्म करना केवल सैन्य अभियान रोकने का मामला नहीं होता। इसके पीछे कूटनीतिक समझौते, सुरक्षा गारंटी, क्षेत्रीय सहयोगियों की सुरक्षा और भविष्य में संभावित हमलों को रोकने की रणनीति भी शामिल होती है। ऐसे में अमेरिका शायद एक ऐसी स्थिति तैयार करना चाहता है जिसमें युद्ध समाप्ति का राजनीतिक संदेश दिया जाए, लेकिन जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई के लिए पर्याप्त ताकत भी उसके पास मौजूद रहे।
दूसरी ओर, ईरान के लिए भी यह स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। अगर अमेरिका युद्ध समाप्ति की घोषणा करता है लेकिन पश्चिम एशिया में सैनिकों की तैनाती बढ़ाता रहता है, तो तेहरान इसे भरोसे के संकेत के बजाय दबाव की रणनीति के रूप में देख सकता है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत की दिशा बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप सच में ईरान युद्ध को खत्म करने की तैयारी कर रहे हैं, या फिर अमेरिका एक ऐसी नई रणनीति अपना रहा है जिसमें युद्ध खत्म करने की घोषणा के साथ-साथ सैन्य दबाव भी बरकरार रखा जाएगा? अगर दोनों देशों के बीच तनाव कम नहीं हुआ, तो पश्चिम एशिया में संघर्ष अगले साल तक खिंचने की आशंका भी बनी रह सकती है। आने वाले दिनों में ट्रंप का अगला कदम ही तय करेगा कि अमेरिका युद्ध से बाहर निकलने की राह पर है या फिर एक लंबे और बड़े टकराव की तैयारी कर रहा है।


