संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में इमरान अली के कथित जबरन गायब किए जाने, हिरासत में यातना और बिना कानूनी प्रक्रिया के मारे जाने के मामले पर गंभीर चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने पाकिस्तान से इस पूरे मामले की तत्काल, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 27 अगस्त 2025 को पाकिस्तान के आतंकवाद-रोधी विभाग यानी CTD के करीब 20 कर्मचारियों ने इमरान अली को उसके अपार्टमेंट से कथित तौर पर हिरासत में लिया था। इसके बाद उसे किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया। इस दौरान उसके परिवार को उसके ठिकाने के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय यानी OHCHR की ओर से जारी जानकारी में बताया गया कि अली के साथ हिरासत में रखे गए कुछ लोगों ने रिहाई के बाद पुष्टि की कि इमरान अली भी हिरासत में था। इन लोगों के अनुसार, अली को कथित तौर पर कई दिनों तक यातना दी गई।
इसके बाद इमरान अली की मौत की खबर सामने आई, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठाए। विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद उसके परिवार को जानकारी नहीं देना और फिर उसकी मौत की खबर सामने आना गंभीर मानवाधिकार चिंताओं को जन्म देता है।
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने पाकिस्तान से मांग की है कि इमरान अली की हिरासत और मौत से जुड़ी सभी परिस्थितियों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जाए। जांच में यह पता लगाया जाना जरूरी है कि उसे किस आधार पर हिरासत में लिया गया, उसे कहां रखा गया और हिरासत के दौरान उसके साथ क्या हुआ।
विशेषज्ञों ने यह भी जोर दिया है कि अगर जांच में किसी सरकारी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की जिम्मेदारी सामने आती है तो उसके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही पीड़ित के परिवार को न्याय और उचित जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी और मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जताई जाती रही है। ऐसे में इमरान अली का मामला पाकिस्तान में कानून के शासन, हिरासत की प्रक्रिया और सुरक्षा एजेंसियों की जवाबदेही से जुड़े सवालों को फिर सामने लाता है।
इस मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इमरान अली को आखिर क्यों हिरासत में लिया गया और उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई। अगर यातना और गैर-कानूनी हत्या के आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन का मामला माना जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की मांग के बाद अब पाकिस्तान सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। एक स्वतंत्र जांच ही इस मामले की सच्चाई सामने ला सकती है और यह तय कर सकती है कि इमरान अली की हिरासत से लेकर उसकी मौत तक की घटनाओं के लिए कौन जिम्मेदार था।


