12 सितंबर से नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन शुरू होने जा रहा है। भारत इस बार BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और सम्मेलन में रूस, चीन समेत कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रतिनिधि शामिल होने वाले हैं। इस सम्मेलन को लेकर देश और दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हुई हैं। खासतौर पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत दौरा इस बैठक को और ज्यादा महत्वपूर्ण बना रहा है। करीब सात साल बाद शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं, ऐसे में दोनों देशों के संबंधों को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
BRICS सम्मेलन शुरू होने से पहले ही भारत में इसे लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने हालिया BRICS बैठकों को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि इन बैठकों से भारत को कोई बड़ा ठोस नतीजा हासिल नहीं हुआ। उनके इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर पलटवार किया और कहा कि BRICS की भूमिका को समझने के लिए केवल कुछ बैठकों के नतीजे देखने के बजाय लंबे समय के प्रभाव को भी देखना चाहिए।
बीजेपी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि 1947 से लेकर 2014 तक का हिसाब भी देखा जाना चाहिए। पार्टी का कहना है कि आज भारत जिस तरह दुनिया के अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संबंध बना रहा है, वह उसकी विदेश नीति की बड़ी उपलब्धि है। BRICS जैसे मंच भारत को चीन और रूस जैसे देशों के साथ एक ही टेबल पर बातचीत करने का अवसर देते हैं, जबकि भारत अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है।
अब सवाल यह है कि आखिर BRICS भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है? BRICS दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। इसके विस्तार के बाद इसमें कई नए देश भी शामिल हुए हैं। ऐसे में इसका आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव पहले की तुलना में काफी बढ़ा है। भारत के लिए यह मंच वैश्विक दक्षिण यानी Global South के देशों के हितों को मजबूती से उठाने का एक बड़ा माध्यम है।
BRICS के जरिए भारत वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में सुधार, विकासशील देशों के लिए ज्यादा प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में बदलाव जैसे मुद्दों को आगे बढ़ा सकता है। इसके अलावा व्यापार, निवेश, ऊर्जा, तकनीक और खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी सदस्य देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं।
इस मंच की सबसे बड़ी खासियत यह है कि भारत यहां अपने कई महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ बातचीत कर सकता है। रूस भारत का पुराना रणनीतिक साझेदार है, जबकि चीन के साथ भारत के रिश्ते जटिल होने के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार और सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। ऐसे में BRICS भारत को चीन के साथ संवाद का एक अतिरिक्त मंच भी उपलब्ध कराता है।
इस बार शी जिनपिंग की भारत यात्रा पर खास नजर रहेगी। सात साल बाद उनका भारत आना दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और व्यापार असंतुलन जैसे कई मुद्दे अब भी चुनौती बने हुए हैं। ऐसे में BRICS सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के नेताओं के बीच संभावित बातचीत को लेकर भी काफी उत्सुकता है।
दूसरी तरफ अमेरिका की नजर भी BRICS के बढ़ते प्रभाव पर है। BRICS के विस्तार के बाद इसका आर्थिक और रणनीतिक महत्व बढ़ा है। यही वजह है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों में इस समूह की बढ़ती भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है। हालांकि भारत के लिए BRICS का उद्देश्य किसी एक देश के खिलाफ मोर्चा बनाना नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार अलग-अलग देशों के साथ संबंधों को संतुलित करना है।
भारत की विदेश नीति में इसी संतुलन की झलक दिखाई देती है। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में साझेदारी बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ उसके पुराने संबंध कायम हैं। चीन के साथ मतभेदों के बावजूद भारत BRICS और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर उसके साथ बातचीत जारी रखता है। यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत को वैश्विक राजनीति में अलग पहचान देती है।
कांग्रेस की आलोचना के बीच बीजेपी का कहना है कि BRICS की उपलब्धियों को केवल इस आधार पर नहीं मापा जा सकता कि किसी एक सम्मेलन में कितने समझौते हुए। इस मंच के जरिए भारत को वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने, विकासशील देशों के साथ सहयोग बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर मिलता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि दिल्ली में होने वाला BRICS सम्मेलन भारत के लिए कितने ठोस नतीजे लेकर आता है। क्या भारत आर्थिक और व्यापारिक सहयोग के क्षेत्र में कोई बड़ी पहल कर पाएगा? क्या चीन के साथ संबंधों को लेकर कोई सकारात्मक संकेत सामने आएगा? और क्या BRICS वैश्विक राजनीति में अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभाव के बीच एक मजबूत वैकल्पिक शक्ति के रूप में उभर पाएगा?
इन सभी सवालों के जवाब सम्मेलन के दौरान सामने आएंगे। फिलहाल इतना तय है कि BRICS भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय संगठन नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक ताकत, कूटनीतिक प्रभाव और रणनीतिक स्वायत्तता को दुनिया के सामने रखने का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। शी जिनपिंग की भारत यात्रा और रूस समेत कई बड़े देशों की भागीदारी ने इस सम्मेलन की अहमियत और बढ़ा दी है। अब पूरी दुनिया की नजर दिल्ली पर है कि भारत की अध्यक्षता में BRICS किस दिशा में आगे बढ़ता है और इसका सबसे बड़ा फायदा भारत को कितना मिलता है।


