भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने के लिए संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘युद्ध अभ्यास 2026’ का 22वां संस्करण शुरू होने जा रहा है। इस बार अभ्यास में कई आधुनिक सैन्य तकनीकों और क्षमताओं को शामिल किया जा रहा है। खास तौर पर पहली बार काउंटर-ड्रोन सिस्टम के ट्रायल को लेकर चर्चा है। माना जा रहा है कि ड्रोन से बढ़ते खतरे के बीच यह क्षमता भारतीय सेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
इस संयुक्त अभ्यास में भारत और अमेरिकी सेना के जवान मिलकर अलग-अलग युद्ध परिस्थितियों में ऑपरेशन की तैयारी करेंगे। इस बार अमेरिकी सेना के 11वें एयरबोर्न डिवीजन के आर्कटिक-ट्रेंड सैनिक भी हिस्सा लेंगे। ये सैनिक अलास्का के फोर्ट वेनराइट में तैनात हैं और बेहद ठंडे तथा कठिन इलाकों में ऑपरेशन के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित हैं। भारत के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में होने वाला यह प्रशिक्षण दोनों सेनाओं के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
युद्ध अभ्यास 2026 में अमेरिकी सेना की 3rd मल्टी-डोमेन टास्क फोर्स यानी 3MDTF की भागीदारी भी इसे खास बनाती है। इस यूनिट के जरिए अभ्यास में आधुनिक लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन फायर और इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम जैसी क्षमताओं को शामिल किया जाएगा। इसका उद्देश्य अलग-अलग सैन्य संसाधनों के बीच बेहतर तालमेल और आधुनिक युद्ध परिस्थितियों में तेज निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत करना है।
सबसे ज्यादा ध्यान काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर है। आज के युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है और छोटे ड्रोन भी निगरानी से लेकर हमले तक के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। ऐसे में दुश्मन के ड्रोन को समय रहते पहचानना, ट्रैक करना और उसे निष्क्रिय करना किसी भी आधुनिक सेना के लिए महत्वपूर्ण क्षमता बन गई है। संयुक्त अभ्यास में इस तरह की तकनीक का प्रशिक्षण भारतीय सैनिकों को बदलते युद्धक्षेत्र के लिए तैयार करने में मदद कर सकता है।
भारत के लिए इस अभ्यास की रणनीतिक अहमियत इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि देश की सीमाओं पर ड्रोन से जुड़े खतरे लगातार सुरक्षा चर्चा का हिस्सा रहे हैं। खासकर पाकिस्तान सीमा पर ड्रोन के जरिए हथियार और अन्य सामान भेजे जाने की घटनाओं ने काउंटर-ड्रोन तकनीक की जरूरत को और बढ़ाया है। वहीं चीन के साथ ऊंचाई वाले सीमावर्ती इलाकों में चुनौती को देखते हुए आधुनिक निगरानी और कमांड सिस्टम का महत्व भी बढ़ गया है।
इस अभ्यास में भारतीय और अमेरिकी सैनिक कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में संयुक्त अभियान की तकनीक सीखेंगे। ऊंचाई वाले इलाकों में सैन्य अभियान चलाना सामान्य परिस्थितियों की तुलना में काफी चुनौतीपूर्ण होता है। कम ऑक्सीजन, कठिन मौसम और दुर्गम इलाके सैनिकों के साथ-साथ हथियार प्रणालियों और लॉजिस्टिक्स के लिए भी बड़ी चुनौती होते हैं। ऐसे में दोनों सेनाओं के बीच अनुभव साझा करना काफी उपयोगी हो सकता है।
अभ्यास में एडवांस्ड लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन फायर को भी शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य लंबी दूरी से सटीक लक्ष्य भेदने की क्षमता को बेहतर बनाना है। इसके साथ इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा, जिससे अलग-अलग सैन्य यूनिट्स के बीच सूचनाओं और आदेशों का आदान-प्रदान ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके।
इस दौरान भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और अमेरिकी सेना प्रशांत के डिप्टी कमांडिंग जनरल लेफ्टिनेंट जनरल जोएल ‘जेबी’ वोवेल के प्रमुख ट्रेनिंग कार्यक्रमों में शामिल होने की जानकारी भी सामने आई है। उनकी मौजूदगी भारत-अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग को दर्शाती है।
युद्ध अभ्यास भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रहे संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों में से एक है। ऐसे अभ्यासों के जरिए दोनों देशों के सैनिक एक-दूसरे की सैन्य प्रक्रियाओं, उपकरणों और ऑपरेशनल तरीकों को समझते हैं। इससे भविष्य में किसी संयुक्त मानवीय सहायता, आपदा राहत या सैन्य अभियान की स्थिति में बेहतर तालमेल बनाने में मदद मिल सकती है।
इस बार का अभ्यास 28 सितंबर को समाप्त होगा। हालांकि इसका महत्व केवल अभ्यास की अवधि तक सीमित नहीं रहेगा। काउंटर-ड्रोन तकनीक, लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता और आधुनिक कमांड सिस्टम जैसी क्षमताओं से जुड़े अनुभव भविष्य के सैन्य अभियानों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, ‘युद्ध अभ्यास 2026’ भारत और अमेरिका के बीच रक्षा साझेदारी को नई तकनीक और आधुनिक युद्ध क्षमताओं से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण अभ्यास है। काउंटर-ड्रोन सिस्टम के ट्रायल और ऊंचाई वाले इलाकों में विशेष प्रशिक्षण से भारतीय सेना की बदलते सुरक्षा खतरों से निपटने की क्षमता को मजबूत करने की दिशा में मदद मिल सकती है। अब इस अभ्यास के दौरान दोनों सेनाएं आधुनिक युद्ध के इन नए पहलुओं पर किस तरह प्रशिक्षण और अनुभव साझा करती हैं, इस पर नजर रहेगी।


