संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने सुरक्षा परिषद में बड़े सुधार की जोरदार मांग उठाई। अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम उच्चस्तरीय महासभा संबोधन में गुतारेस ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना आज की वैश्विक वास्तविकताओं को सही तरीके से प्रतिबिंबित नहीं करती। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद का गठन दूसरे विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों में हुआ था, लेकिन तब से दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक तस्वीर में व्यापक बदलाव आ चुके हैं। इसके बावजूद परिषद की संरचना में उन बदलावों की पर्याप्त झलक नहीं दिखाई देती।
गुतारेस ने अपने करीब 35 मिनट के संबोधन में खास तौर पर अफ्रीका के स्थायी प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी, तब अफ्रीका का बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक शासन के अधीन था। आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है, लेकिन सुरक्षा परिषद में अफ्रीका के पास अब भी कोई स्थायी सीट नहीं है। गुतारेस ने इसे 21वीं सदी की सुरक्षा परिषद के संदर्भ में अन्यायपूर्ण और अनुचित बताया और कहा कि इस स्थिति को बदला जाना चाहिए। उनके इस बयान का महासभा में मौजूद नेताओं ने तालियों के साथ समर्थन किया।
सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र की सबसे प्रभावशाली संस्थाओं में से एक है और इसमें कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका हैं, जबकि दस अस्थायी सदस्य निर्धारित अवधि के लिए चुने जाते हैं। स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार है। गुतारेस ने कहा कि मौजूदा समय में बढ़ते भू-राजनीतिक मतभेदों और ध्रुवीकरण के बीच वैश्विक संस्थाओं पर दबाव बढ़ रहा है। उनके अनुसार, दुनिया में संघर्षों और संकटों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन सामूहिक कार्रवाई के लिए बनाए गए तंत्र कई बार प्रभावी तरीके से काम नहीं कर पा रहे हैं।
गुतारेस की यह अपील ऐसे समय में सामने आई है जब सुरक्षा परिषद की भूमिका और उसकी कार्यक्षमता को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। गाजा और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर स्थायी सदस्यों के बीच गंभीर मतभेद सामने आते रहे हैं। वीटो व्यवस्था के कारण कई प्रस्तावों पर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण रहा है। गुतारेस ने अपने संबोधन में सीधे तौर पर किसी एक देश को जिम्मेदार ठहराने के बजाय व्यापक वैश्विक व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया।
भारत भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और विस्तार की मांग लंबे समय से करता रहा है। भारत का तर्क है कि 1945 में बनी मौजूदा 15 सदस्यीय व्यवस्था 21वीं सदी की वैश्विक परिस्थितियों का पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं करती। भारत सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने की वकालत करता रहा है। नई दिल्ली का कहना है कि बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, जनसंख्या, राजनीतिक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को देखते हुए परिषद की संरचना में व्यापक सुधार आवश्यक है।
भारत ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के अपने दावे को भी लगातार सामने रखा है। इसके साथ ही भारत 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद की अस्थायी सीट हासिल करने की कोशिश कर रहा है, जिसके लिए अगले वर्ष जून में चुनाव होना प्रस्तावित है। सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया हालांकि लंबे समय से चल रही है और सदस्य देशों के बीच इसके स्वरूप को लेकर अलग-अलग विचार हैं। इसी वजह से सुधार को लेकर अंतिम सहमति बनाना एक जटिल प्रक्रिया बनी हुई है।
गुतारेस ने अपने संबोधन में केवल सुरक्षा परिषद ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक शासन व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया में आर्थिक, राजनीतिक और प्रौद्योगिकी प्रभाव के नए केंद्र उभर रहे हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अभी भी काफी हद तक पुराने दौर की ताकतों और परिस्थितियों को दर्शाती हैं। उन्होंने बढ़ती असमानता, भू-राजनीतिक विभाजन और देशों के बीच विश्वास की कमी को भी बड़ी चुनौती बताया।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा कि दुनिया स्पष्ट रूप से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है और यह बदलाव वापस पलटने वाला नहीं है। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि बहुध्रुवीयता अलग-अलग रूप ले सकती है और इसका स्वरूप इस बात पर निर्भर करेगा कि देश वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए किस तरह सहयोग करते हैं। अपने अंतिम उच्चस्तरीय महासभा संबोधन के बाद जब गुतारेस मंच से नीचे उतरे तो महासभा में मौजूद नेताओं, विदेश मंत्रियों, राजदूतों, राजनयिकों और संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारियों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया। उनका दूसरा कार्यकाल दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाला है। इस तरह गुतारेस का संबोधन संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा व्यवस्था में सुधार, सुरक्षा परिषद के विस्तार और बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना के बीच अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वकारी बनाने की बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया।


