लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और इंजीनियर सोनम वांगचुक की आमरण भूख हड़ताल को लेकर देशभर में चर्चा तेज है। उनकी सेहत को लेकर चिंता जताई जा रही है और इस बीच एक बड़ा कानूनी सवाल भी सामने आया है—क्या भारत में आमरण अनशन करना कानूनी है? और यदि किसी आंदोलनकारी की जान खतरे में पड़ जाए, तो सरकार कब और कैसे हस्तक्षेप कर सकती है?
सोनम वांगचुक 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि लगातार उपवास के कारण उनकी सेहत बिगड़ रही है। इसी बीच दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें सरकार से उनकी जान बचाने के लिए आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की मांग की गई।
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि “जीवन अनमोल है” और केंद्र सरकार तथा संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वांगचुक की नियमित स्वास्थ्य जांच कराई जाए और जरूरत पड़ने पर उन्हें आवश्यक चिकित्सा सहायता दी जाए। हालांकि अदालत ने उन्हें जबरन खाना खिलाने का कोई आदेश नहीं दिया।
जवाब है—नहीं। भारत का संविधान नागरिकों को अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है। इसी कारण शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन और सांकेतिक उपवास जैसे तरीके सामान्यतः संवैधानिक अधिकारों के दायरे में आते हैं।
लेकिन जब कोई व्यक्ति आमरण अनशन पर बैठता है और उसकी जान को गंभीर खतरा होने लगता है, तब स्थिति अलग हो जाती है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति को जीवन का अधिकार प्राप्त है और उसकी रक्षा करना राज्य का दायित्व भी है। इसी आधार पर सरकार और प्रशासन जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप कर सकते हैं।
हालांकि भारत में ऐसा कोई सामान्य कानून नहीं है जो हर भूख हड़ताल करने वाले व्यक्ति को जबरन खाना खिलाने की अनुमति देता हो। आमतौर पर प्रशासन पहले डॉक्टरों की सलाह, स्वास्थ्य जांच, काउंसलिंग और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश करता है। यदि अदालत निर्देश दे या डॉक्टरों की राय में व्यक्ति की जान को तत्काल खतरा हो, तो उसे अस्पताल में भर्ती कर इलाज उपलब्ध कराया जा सकता है।
पुलिस भी कुछ परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर सकती है। यदि प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है, सार्वजनिक रास्ते बाधित होते हैं या आवश्यक अनुमति का उल्लंघन होता है, तो प्रशासन कार्रवाई कर सकता है। हालांकि ऐसी कार्रवाई आमतौर पर सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के आधार पर की जाती है, न कि केवल भूख हड़ताल के कारण।
भारत में भूख हड़ताल का लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने इसे अहिंसक विरोध के प्रभावी माध्यम के रूप में अपनाया था। बाद के वर्षों में अन्ना हजारे, इरोम शर्मिला और कई अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपनी मांगों के समर्थन में लंबे उपवास किए। कई मामलों में सरकार ने शुरुआत में आंदोलन की अनुमति दी, लेकिन स्वास्थ्य बिगड़ने पर चिकित्सा निगरानी या अस्पताल में भर्ती जैसी कार्रवाई भी की गई।
फिलहाल सोनम वांगचुक का मामला केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि संविधान, नागरिक अधिकार और सरकार की जिम्मेदारी के बीच संतुलन की परीक्षा भी बन गया है। अब आगे की दिशा अदालत के निर्देशों, डॉक्टरों की सलाह और सरकार तथा आंदोलनकारियों के बीच बातचीत पर निर्भर करेगी।


