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China Border पर भारत का बड़ा दांव! 1000 मीटर गहरे 2 कुएं, जमीन के अंदर मिला ऊर्जा का खजाना

भारत ने लद्दाख में चीन सीमा के पास एक ऐसा कदम उठाया है, जिसे सिर्फ ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लद्दाख की पुगा घाटी में ओएनजीसी ने लगभग 1000 मीटर गहरे दूसरे जियोथर्मल कुएं की सफल ड्रिलिंग पूरी कर ली है। इससे पहले पहला कुआं भी सफल रहा था और अब यह परियोजना भारत के पहले 1 मेगावाट जियोथर्मल पायलट पावर प्लांट की दिशा में एक अहम उपलब्धि मानी जा रही है।

यह इलाका समुद्र तल से लगभग 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहां बेहद कम ऑक्सीजन, कड़ाके की ठंड और कठिन मौसम के बीच काम करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। ऐसे हालात में इतनी गहराई तक सफल ड्रिलिंग अपने आप में बड़ी तकनीकी उपलब्धि है।

अब सवाल है कि आखिर जियोथर्मल ऊर्जा क्या होती है?

जियोथर्मल ऊर्जा पृथ्वी के भीतर मौजूद प्राकृतिक गर्मी से प्राप्त की जाती है। जमीन के नीचे मौजूद गर्म पानी और भाप का उपयोग कर बिजली बनाई जाती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 24 घंटे उपलब्ध रहने वाला स्वच्छ ऊर्जा स्रोत है। यह न तो धूप पर निर्भर करता है और न ही हवा पर।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना सफल रहती है, तो भविष्य में लद्दाख जैसे दूरदराज़ इलाकों में ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत किया जा सकता है और डीजल आधारित बिजली उत्पादन पर निर्भरता कम हो सकती है।

इस परियोजना का सामरिक महत्व भी कम नहीं है। पुगा घाटी वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC के अपेक्षाकृत नजदीक स्थित क्षेत्र में है। ऐसे में यहां आधुनिक ऊर्जा अवसंरचना का विकास सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और सुरक्षा बलों के लिए भी लाभदायक हो सकता है।

भारत ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। ऐसे में जियोथर्मल ऊर्जा जैसी परियोजनाएं देश की स्वच्छ ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं।

हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि इस परियोजना का उद्देश्य केवल किसी दूसरे देश को संदेश देना है। इसका प्रमुख लक्ष्य स्वदेशी, स्वच्छ और भरोसेमंद ऊर्जा का विकास, सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाना है।

अगर आने वाले वर्षों में इस तकनीक का बड़े पैमाने पर विस्तार होता है, तो भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो सकता है जो जियोथर्मल ऊर्जा का प्रभावी उपयोग कर रहे हैं।

कुल मिलाकर, लद्दाख की पुगा घाटी में हुई यह सफलता भारत की तकनीकी क्षमता, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में काम करने की दक्षता का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जा रही है। अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि प्रस्तावित जियोथर्मल पावर प्लांट कब तक पूरी तरह शुरू होता है और इससे क्षेत्र को कितना लाभ मिलता है।

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