आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर दुनिया में प्रतिस्पर्धा लगातार तेज़ होती जा रही है। इसी बीच चीन ने एक बड़ा कदम उठाते हुए विकासशील देशों के लिए एक नई पहल का ऐलान किया है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने घोषणा की है कि आने वाले पांच वर्षों में चीन 5,000 AI प्रोजेक्ट्स के जरिए विकासशील देशों को तकनीकी सहयोग देगा।
शंघाई में आयोजित वर्ल्ड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कॉन्फ्रेंस 2026 को संबोधित करते हुए शी जिनपिंग ने कहा कि AI का विकास किसी एक देश का अकेला प्रदर्शन नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सहयोग का परिणाम होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तेजी से आगे बढ़ रही है और यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि इसका उपयोग मानवता के हित, शांति और साझा विकास के लिए हो।
अपने संबोधन में शी जिनपिंग ने कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए। उन्होंने कहा कि दुनिया को यह तय करना होगा कि इंसान और सोचने वाली मशीनें भविष्य में किस तरह साथ काम करेंगी। जब एल्गोरिदम निर्णय लेने लगेंगे, तब सुरक्षा और पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाएगी? और AI से जुड़ी नैतिक चुनौतियों का समाधान किस तरह किया जाएगा?
शी जिनपिंग ने जोर देकर कहा कि AI का लाभ केवल कुछ विकसित देशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनका कहना था कि दुनिया के सभी देशों, विशेषकर विकासशील देशों को भी इस तकनीक का समान अवसर मिलना चाहिए।
इसी सम्मेलन के दौरान एक और बड़ा कदम उठाया गया। 29 देशों ने मिलकर ‘वर्ल्ड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन’ नामक एक नए अंतर-सरकारी संगठन की स्थापना के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस संगठन का मुख्यालय चीन के शंघाई शहर में होगा।
इस नए संगठन का उद्देश्य AI के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना, साझा नियम विकसित करना और तकनीकी विकास को अधिक समावेशी बनाना बताया गया है।
शी जिनपिंग ने यह भी घोषणा की कि चीन अगले पांच वर्षों में 5,000 AI रिसर्च प्रोजेक्ट्स, प्रशिक्षण कार्यक्रम, सेमिनार और सहयोग केंद्रों के माध्यम से विकासशील देशों की मदद करेगा।
इन देशों में आसियान, ब्रिक्स, अफ्रीकी संघ, अरब लीग, शंघाई सहयोग संगठन और लैटिन अमेरिका के कई देश शामिल बताए गए हैं।
चीन का कहना है कि उसका उद्देश्य AI तकनीक को साझा विकास का माध्यम बनाना है, ताकि तकनीकी असमानता कम हो और अधिक से अधिक देश इस क्षेत्र में आगे बढ़ सकें।
हालांकि, वैश्विक स्तर पर AI गवर्नेंस को लेकर अलग-अलग देशों की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं और रणनीतियां हैं। ऐसे में इस नई पहल का भविष्य इस बात पर भी निर्भर करेगा कि सदस्य देश किस तरह मिलकर काम करते हैं और प्रस्तावित संगठन कितना प्रभावी साबित होता है।
फिलहाल इतना तय है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल तकनीक का विषय नहीं रह गया है। यह वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और भविष्य की प्रतिस्पर्धा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
अब दुनिया की नजर इस बात पर रहेगी कि चीन की यह नई पहल आने वाले वर्षों में AI के वैश्विक परिदृश्य को किस हद तक प्रभावित कर पाती है।


