अमेरिका में H-1B और L-1 वीजा से जुड़े नियमों में बदलाव की खबर से विदेशी कर्मचारियों पर निर्भर कंपनियों की चिंता बढ़ गई है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी यानी DHS ने कुछ खास नियोक्ताओं के लिए वीजा एक्सटेंशन पर भी अतिरिक्त शुल्क लागू करने का फैसला किया है। इससे अमेरिका में बड़ी संख्या में विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों के इमिग्रेशन खर्च में बढ़ोतरी हो सकती है।
अपडेट किए गए नियम के तहत, कुछ पात्र कंपनियों को किसी कर्मचारी के अमेरिका में रहने की अवधि बढ़ाने यानी वीजा एक्सटेंशन के लिए भी अतिरिक्त शुल्क देना होगा। पहले इस तरह की फीस आमतौर पर शुरुआती रोजगार या कर्मचारी के नियोक्ता बदलने से जुड़े आवेदन के समय लागू होती थी। मौजूदा नियोक्ता द्वारा उसी कर्मचारी के लिए कराए जाने वाले एक्सटेंशन को कुछ परिस्थितियों में इस शुल्क से छूट मिली हुई थी।
अब नए नियम के तहत H-1B याचिकाओं के लिए 4,000 अमेरिकी डॉलर और L-1 याचिकाओं के लिए 4,500 अमेरिकी डॉलर की फीस को कुछ एक्सटेंशन मामलों तक बढ़ाया गया है। यानी अगर कोई कंपनी पात्र श्रेणी में आती है और उसका विदेशी कर्मचारी उसी कंपनी के साथ काम जारी रखते हुए अपना स्टेटस बढ़ाता है, तो संबंधित याचिका पर यह अतिरिक्त शुल्क लागू हो सकता है।
यह नया नियम खास तौर पर उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है जो अमेरिका में विदेशी टैलेंट पर काफी निर्भर हैं। H-1B वीजा का इस्तेमाल मुख्य रूप से विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में काम करने के लिए किया जाता है, जबकि L-1 वीजा के जरिए किसी कंपनी के विदेशी कार्यालय से जुड़े कर्मचारियों को अमेरिका में ट्रांसफर किया जा सकता है।
नए नियम का असर हर कंपनी पर समान रूप से नहीं पड़ेगा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह व्यवस्था खास श्रेणी के नियोक्ताओं पर लागू होगी। इनमें ऐसी कंपनियां शामिल हैं जो अमेरिका में कम से कम 50 कर्मचारियों को रोजगार देती हैं और जिनके घरेलू वर्कफोर्स में 50 प्रतिशत से अधिक कर्मचारी सामूहिक रूप से H-1B, L-1A या L-1B स्टेटस पर हैं।
इस बदलाव का असर भारतीय IT कंपनियों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत की कई बड़ी टेक और IT सर्विस कंपनियां अमेरिकी बाजार में बड़ी संख्या में कर्मचारियों के साथ काम करती हैं और उनके बिजनेस मॉडल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कर्मचारियों की आवाजाही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में अतिरिक्त वीजा फीस से कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।
कंपनियों पर सिर्फ एक बार नहीं, बल्कि पात्र कर्मचारियों के एक्सटेंशन के समय भी यह खर्च आ सकता है। यही वजह है कि विदेशी कर्मचारियों पर निर्भर कंपनियों के लिए यह बदलाव बार-बार होने वाले इमिग्रेशन खर्च को बढ़ा सकता है। इसका असर कंपनियों के बजट, कर्मचारी ट्रांसफर की रणनीति और अमेरिका में नए कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़े फैसलों पर भी पड़ सकता है।
इस नियम के पीछे अमेरिकी प्रशासन का तर्क और इसका विस्तृत नियामकीय ढांचा आने वाले समय में कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। खासकर बड़ी टेक कंपनियों और IT सर्विस प्रोवाइडर्स को यह देखना होगा कि नए शुल्क की वजह से उनके मौजूदा कर्मचारियों और भविष्य की भर्ती योजनाओं पर कितना असर पड़ता है।
भारतीय IT सेक्टर के लिए अमेरिका बेहद महत्वपूर्ण बाजार है। ऐसे में वीजा नियमों में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव भारतीय कंपनियों की लागत और अमेरिका में उनकी वर्कफोर्स प्लानिंग को प्रभावित कर सकता है। कंपनियों को अब अपने कर्मचारियों के वीजा एक्सटेंशन और इमिग्रेशन बजट की पहले से ज्यादा सावधानी से योजना बनानी पड़ सकती है।
नया नियम 9 सितंबर से लागू होने वाला है। इसके बाद पात्र नियोक्ताओं को संबंधित H-1B और L-1 एक्सटेंशन याचिकाओं के दौरान नई फीस की व्यवस्था को ध्यान में रखना होगा। हालांकि, इस नियम का वास्तविक वित्तीय असर कंपनी के कर्मचारियों की संख्या, वीजा स्टेटस और पात्र याचिकाओं की संख्या पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर, अमेरिका के नए वीजा नियमों से विदेशी कर्मचारियों पर निर्भर कुछ कंपनियों के लिए इमिग्रेशन प्रक्रिया महंगी हो सकती है। भारतीय IT कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे बढ़ती वीजा लागत और अमेरिकी बाजार में कुशल कर्मचारियों की जरूरत के बीच संतुलन कैसे बनाए रखती हैं।


