सऊदी अरब और यमन के अंसारुल्लाह यानी हूती लड़ाकों के बीच चल रहे संघर्ष में अब तस्वीर और भी जटिल होती दिखाई दे रही है। सऊदी अरब को क्षेत्रीय स्तर पर समर्थन देने के लिए तुर्की और पाकिस्तान की सैन्य मदद की चर्चा तेज हो गई है। मक्का रक्षा समझौते के तहत दोनों देशों की सेनाएं सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, सामने आ रही जानकारी के मुताबिक इन सेनाओं के सीधे यमन में जाकर लड़ने की बात नहीं है। इसके बावजूद उनकी मौजूदगी इस पूरे संघर्ष के समीकरण को बदल सकती है।
मक्का रक्षा समझौते के सक्रिय होने के बाद सऊदी अरब की सैन्य क्षमता को अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब के पुराने सैन्य संबंध हैं और पाकिस्तानी सैनिक पहले से ही सऊदी अरब में मौजूद रहे हैं। ऐसे में नई व्यवस्था के तहत तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण और वायुसेना से जुड़ी क्षमताओं को और मजबूत किए जाने की संभावना है। तुर्की की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि उसके पास ड्रोन तकनीक और आधुनिक सैन्य क्षमताओं का व्यापक अनुभव है।
दूसरी तरफ यमन में सऊदी समर्थित गठबंधन और अंसारुल्लाह के बीच संघर्ष लगातार जारी है। पिछले कुछ समय में यमन के अलग-अलग इलाकों में हवाई हमलों की खबरें सामने आई हैं। सऊदी समर्थित गठबंधन की ओर से अंसारुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाए जाने और उन्हें नुकसान पहुंचाने के दावे किए गए हैं। यमन के मोखा शहर को लेकर भी सऊदी समर्थित ताकतों की ओर से दोबारा नियंत्रण स्थापित करने का दावा किया गया है। हालांकि, जमीन पर स्थिति कितनी स्थिर है, इसे लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
अंसारुल्लाह के लड़ाके भी इन हमलों का मुकाबला करने का दावा कर रहे हैं। संगठन लंबे समय से यमन के बड़े हिस्से में प्रभाव रखता है और उसकी लड़ाई केवल एक बाहरी ताकत के खिलाफ नहीं है। यमन का यह संघर्ष कई स्थानीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के हितों से जुड़ चुका है। यही वजह है कि इसे केवल सऊदी अरब और हूतियों के बीच की लड़ाई मानना पूरी तस्वीर को समझने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
इस संघर्ष में सबसे बड़ा सवाल यमन की सरकारी सेनाओं की भूमिका को लेकर भी उठता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के समर्थन में लड़ने वाली विभिन्न ताकतें मौजूद हैं, लेकिन इन समूहों के बीच भी राजनीतिक और सैन्य हितों को लेकर मतभेद रहे हैं। यही कारण है कि यमन में किस ताकत का नियंत्रण कितना है और कौन किसके निर्देश पर कार्रवाई कर रहा है, इसे समझना बेहद मुश्किल हो जाता है।
सऊदी अरब के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि अंसारुल्लाह ने लंबे समय तक असममित युद्ध की रणनीति अपनाई है। हवाई शक्ति के मामले में सऊदी समर्थित गठबंधन मजबूत हो सकता है, लेकिन जमीन पर किसी इलाके को नियंत्रित करना अलग चुनौती है। दूसरी तरफ अंसारुल्लाह स्थानीय भूगोल और लंबे संघर्ष के अनुभव का फायदा उठाता है।
अब पाकिस्तान और तुर्की की संभावित सैन्य भूमिका के बाद सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब को रणनीतिक बढ़त मिलेगी या यमन का संघर्ष और ज्यादा पेचीदा हो जाएगा। फिलहाल इतना साफ है कि यह जंग केवल दो पक्षों के बीच सीमित नहीं रह गई है। इसके पीछे कई क्षेत्रीय ताकतें, स्थानीय गुट और अलग-अलग सैन्य हित सक्रिय हैं। आने वाले दिनों में मक्का रक्षा समझौते के तहत होने वाली गतिविधियां और यमन में जमीनी स्थिति इस पूरे संघर्ष की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।


