दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में सार्वजनिक इस्तेमाल वाली इमारतों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि मौजूदा कानून के तहत ऐसी इमारतों का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराना अनिवार्य है या नहीं। कोर्ट ने बिल्डिंग और प्लानिंग से जुड़े कानूनों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित पक्षों से सहायता भी मांगी है।
यह मामला सत्य निकेतन में हुए एक दर्दनाक इमारत हादसे से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। 6 सितंबर को सत्य निकेतन में एक इमारत गिरने की घटना हुई थी, जिसमें सात लोगों की मौत हो गई थी। हादसे के बाद इमारतों की संरचनात्मक सुरक्षा और सरकारी स्तर पर उनकी नियमित जांच को लेकर सवाल उठने लगे।
हादसे वाली इमारत करीब 50 साल पुरानी बताई गई है और यह पांच मंजिला थी। इसका इस्तेमाल लड़कों के पेइंग गेस्ट यानी PG के तौर पर किया जा रहा था। इमारत के गिरने के बाद यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया कि क्या पुरानी और सार्वजनिक इस्तेमाल वाली इमारतों की समय-समय पर संरचनात्मक जांच की कोई अनिवार्य व्यवस्था है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इसी कानूनी पहलू पर स्पष्टता मांगी। अदालत यह जानना चाहती है कि दिल्ली में मौजूदा कानूनों के तहत सार्वजनिक उपयोग वाली इमारतों के स्ट्रक्चरल ऑडिट की व्यवस्था क्या है और क्या संबंधित विभागों के लिए ऐसी जांच कराना अनिवार्य है।
स्ट्रक्चरल ऑडिट का उद्देश्य किसी इमारत की संरचनात्मक मजबूती की जांच करना होता है। इसमें भवन की नींव, बीम, कॉलम, छत और अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों की स्थिति का आकलन किया जाता है। पुरानी इमारतों में ऐसी जांच से संभावित कमजोरियों का समय रहते पता लगाया जा सकता है और जरूरी मरम्मत या सुरक्षा उपाय किए जा सकते हैं।
अदालत ने इस मामले में केवल इमारत की संरचना तक ही सवाल सीमित नहीं रखा, बल्कि सुरक्षा और जवाबदेही से जुड़े पहलुओं पर भी ध्यान दिया। किसी इमारत में बड़ी संख्या में लोगों के रहने या आने-जाने की स्थिति में फायर सेफ्टी और आपातकालीन सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
सत्य निकेतन हादसे ने दिल्ली में पुरानी इमारतों की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ाई है। राजधानी में कई इलाकों में वर्षों पुरानी इमारतें मौजूद हैं और कुछ भवनों का इस्तेमाल आवासीय, व्यावसायिक या अन्य सार्वजनिक गतिविधियों के लिए किया जाता है। ऐसे में उनकी संरचनात्मक स्थिति की नियमित निगरानी को लेकर स्पष्ट नियम और जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है।
अब हाईकोर्ट के सामने यह स्पष्ट किया जाना है कि मौजूदा कानूनी प्रावधान इन इमारतों की जांच को किस तरह नियंत्रित करते हैं। साथ ही यह भी देखा जा सकता है कि अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारी क्या है और किसी इमारत में सुरक्षा संबंधी खामी मिलने पर कार्रवाई की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।
इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से मांगी गई कानूनी स्पष्टता दिल्ली में भवन सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर मौजूदा कानून में स्ट्रक्चरल ऑडिट को लेकर कोई कमी या अस्पष्टता सामने आती है, तो भविष्य में इसे लेकर नीतिगत बदलाव की जरूरत पर भी चर्चा हो सकती है।
फिलहाल हाईकोर्ट का मुख्य फोकस यह पता लगाने पर है कि दिल्ली में सार्वजनिक इस्तेमाल वाली इमारतों की संरचनात्मक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं। सत्य निकेतन हादसे में सात लोगों की मौत के बाद उठे ये सवाल अब अदालत के सामने हैं और आने वाली सुनवाई में इस मामले में स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है।


