मध्य पूर्व में पिछले तीन वर्षों से जारी संघर्ष अब एक नए मोड़ पर पहुंच चुका है। ईरान, हमास और हिज़्बुल्लाह के खिलाफ लगातार सैन्य अभियान चलाने वाले इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अब खुद बड़े राजनीतिक संकट में घिरते नजर आ रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते ने इज़राइल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
करीब एक महीने तक चले सैन्य संघर्ष के बाद हुए इस समझौते को अमेरिका अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बता रहा है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान नेतन्याहू को होता दिखाई दे रहा है। लंबे समय से ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाने वाले नेतन्याहू के कई बड़े लक्ष्य अब भी अधूरे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि नया मध्य पूर्व वैसा नहीं बन पाया है जैसा नेतन्याहू ने वर्षों से कल्पना की थी। गाजा में हमास का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेबनान में हिज़्बुल्लाह अभी भी मजबूत स्थिति में है और ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव भी पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अमेरिका और ईरान के बीच हुई बातचीत में इज़राइल की भूमिका सीमित दिखाई दी। पाकिस्तान को मध्यस्थ के रूप में शामिल किए जाने की खबरों ने भी इज़राइल की चिंता बढ़ा दी है। इससे नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप के रिश्तों में दूरी आने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
लेबनान को लेकर हुए समझौते ने भी इज़राइल की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इस डील के तहत इज़राइल के सैन्य अभियानों पर कई सीमाएं तय की गई हैं, जबकि ईरान ने अपने सहयोगी संगठनों को नियंत्रित रखने का आश्वासन दिया है। इसके बाद नेतन्याहू ने साफ कर दिया कि इज़राइल फिलहाल कब्जे वाले क्षेत्रों से पीछे नहीं हटेगा।
इसके अलावा अक्टूबर 2023 में हुए हमास के हमले की यादें अभी भी इज़राइल की राजनीति पर भारी हैं। उस हमले में करीब 1,200 लोगों की मौत हुई थी और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे थे। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि सरकार समय रहते खतरे का अंदाजा नहीं लगा सकी।
अब अक्टूबर में होने वाले चुनाव नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं। यदि जनता उनकी नीतियों से संतुष्ट नहीं हुई तो यह उनके लंबे राजनीतिक करियर के लिए सबसे कठिन दौर साबित हो सकता है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं। आने वाले महीनों में अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच होने वाले नए घटनाक्रम चुनावी माहौल को पूरी तरह बदल सकते हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप की शांति डील ने नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर संकट खड़ा कर दिया है या फिर इज़राइल के प्रधानमंत्री आखिरी समय में वापसी करने में सफल होंगे। इसका जवाब आने वाले चुनावी परिणाम ही देंगे।


