सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई 22 सितंबर को तय की है। यह मामला संसद और राज्य विधानमंडलों में रिक्त सीटों पर उपचुनाव कराने की समय-सीमा और निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारियों से जुड़ा हुआ है। इस मामले का फैसला भविष्य में उपचुनाव से संबंधित कई मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मंगलवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने निर्वाचन आयोग द्वारा दायर याचिका सहित दो याचिकाओं पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151A की स्पष्ट व्याख्या आवश्यक है। इसके बाद मामले को विस्तृत सुनवाई के लिए 22 सितंबर की तारीख पर सूचीबद्ध कर दिया गया।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A के अनुसार यदि संसद या राज्य विधानमंडल की कोई सीट रिक्त होती है और संबंधित सदस्य का शेष कार्यकाल एक वर्ष या उससे अधिक बचा है, तो निर्वाचन आयोग को रिक्ति की तारीख से छह महीने के भीतर उपचुनाव कराना होता है। हालांकि, इस प्रावधान की व्याख्या और इसके अपवादों को लेकर विवाद बना हुआ है।
यह मामला पुणे लोकसभा सीट से जुड़ा है, जो मार्च 2023 में तत्कालीन सांसद के निधन के बाद रिक्त हुई थी। दिसंबर 2023 में बंबई हाई कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को इस सीट पर तत्काल उपचुनाव कराने का निर्देश दिया था। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि किसी भी संसदीय लोकतंत्र में जनता को लंबे समय तक अपने निर्वाचित प्रतिनिधि से वंचित नहीं रखा जा सकता।
निर्वाचन आयोग ने हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। आयोग का कहना था कि धारा 151A की व्याख्या और उसके लागू होने की परिस्थितियों को स्पष्ट किए जाने की आवश्यकता है। इसी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने दलील दी कि निर्वाचन आयोग अलग-अलग मामलों में धारा 151A की अलग-अलग तरीके से व्याख्या कर रहा है। उनका कहना था कि इससे उपचुनाव कराने की प्रक्रिया में एकरूपता नहीं रह जाती और भ्रम की स्थिति पैदा होती है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि कानून की स्पष्ट व्याख्या जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में समान मानदंड अपनाए जा सकें। अदालत ने संकेत दिया कि इस संबंध में आवश्यक दिशानिर्देश भी तय किए जा सकते हैं।
गौरतलब है कि जनवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने बंबई हाई कोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी, जिसमें पुणे लोकसभा सीट पर तत्काल उपचुनाव कराने का निर्देश दिया गया था। उस समय भी सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि रिक्त सीटों पर चुनाव कराने से जुड़े मामलों में व्यापक दिशानिर्देश तैयार करने की आवश्यकता हो सकती है।
अब 22 सितंबर को होने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट धारा 151A की व्याख्या, निर्वाचन आयोग की भूमिका और उपचुनाव की समय-सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर विस्तार से विचार करेगा। इस फैसले का असर भविष्य में संसद और विधानसभाओं की रिक्त सीटों पर होने वाले उपचुनावों की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।


