मध्य पूर्व में जारी सैन्य तनाव के बीच ईरान ने एक ऐसा कदम उठा लिया है, जिसने ब्रिटेन की सरकार से लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और इजरायल के साथ पहले से ही सैन्य टकराव का सामना कर रहे ईरान ने अब सीधे ब्रिटेन की सैन्य और खुफिया व्यवस्था को निशाने पर ले लिया है। तेहरान ने ब्रिटेन की रॉयल नेवी और रॉयल एयर फोर्स को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है। इतना ही नहीं, ब्रिटेन की विदेशी खुफिया एजेंसी एमआई6 को भी शत्रुतापूर्ण समूह की श्रेणी में डाल दिया गया है। ईरान के इस फैसले को ब्रिटेन के खिलाफ अब तक के सबसे कड़े राजनीतिक और कूटनीतिक कदमों में से एक माना जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर ईरान ने ब्रिटेन के खिलाफ इतनी बड़ी कार्रवाई क्यों की और इसके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या परिणाम हो सकते हैं?
ईरान के विदेश मंत्रालय ने रविवार को इस फैसले की घोषणा की। मंत्रालय की ओर से जारी बयान में ब्रिटेन पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ईरान का कहना है कि ब्रिटिश सरकार अमेरिका और इजरायल की ओर से उसके खिलाफ चलाए जा रहे सैन्य अभियान में सहयोग कर रही है। तेहरान के मुताबिक, ब्रिटेन ने अपने सैन्य ठिकानों, सुविधाओं और रसद व्यवस्था का इस्तेमाल अमेरिकी और इजरायली सैन्य अभियानों को समर्थन देने के लिए करने की अनुमति दी है। ईरान का आरोप है कि इस तरह की सहायता देकर ब्रिटेन सीधे तौर पर उसके खिलाफ चल रही सैन्य कार्रवाई में भागीदार बन गया है।
ईरान के विदेश मंत्रालय ने ब्रिटेन की नीतियों को शत्रुतापूर्ण और गैरकानूनी बताते हुए कहा कि ये कदम संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के विपरीत हैं। मंत्रालय का दावा है कि पिछले एक वर्ष के दौरान ब्रिटेन ने लगातार ऐसे फैसले लिए हैं, जिनसे ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता को नुकसान पहुंचा है। इसी आधार पर ईरान ने ब्रिटेन की सैन्य और खुफिया संस्थाओं के खिलाफ जवाबी कार्रवाई का निर्णय लिया है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण कारण ब्रिटेन की ओर से ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी के खिलाफ उठाया गया कदम भी है। ब्रिटेन ने अपने स्टेट थ्रेट्स एक्ट 2026 के तहत आईआरजीसी को निशाने पर लिया था। ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि यह कार्रवाई उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए जरूरी है। लेकिन ईरान ने इसे अपने खिलाफ शत्रुतापूर्ण कार्रवाई माना। अब तेहरान ने इसी के जवाब में ब्रिटेन की रॉयल नेवी और रॉयल एयर फोर्स को आतंकवादी संगठन घोषित करने का फैसला किया है। ईरान ने इस कार्रवाई को जवाबी कदम और पारस्परिक कार्रवाई के सिद्धांत से जोड़कर पेश किया है।
ईरान के इस फैसले में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी एमआई6 को शत्रुतापूर्ण समूह घोषित करना है। एमआई6 का आधिकारिक नाम सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस है। यह ब्रिटेन की विदेशी खुफिया एजेंसी है, जिसका मुख्य काम दूसरे देशों में खुफिया जानकारी जुटाना, संभावित सुरक्षा खतरों की पहचान करना और ब्रिटिश सरकार को महत्वपूर्ण सूचनाएं उपलब्ध कराना है। अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और जासूसी गतिविधियों से जुड़े मामलों में एमआई6 की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। ईरान ने अपनी कानूनी व्यवस्था के तहत इस एजेंसी को शत्रुतापूर्ण समूह की श्रेणी में रखा है।
वहीं, ब्रिटेन की रॉयल नेवी देश की समुद्री सैन्य शक्ति है, जो समुद्री सीमाओं की सुरक्षा, युद्धपोतों के संचालन और अंतरराष्ट्रीय समुद्री अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। दूसरी ओर रॉयल एयर फोर्स ब्रिटेन की वायुसेना है, जो हवाई सुरक्षा, लड़ाकू विमानों के संचालन और सैन्य अभियानों के लिए जिम्मेदार है। इन दोनों संस्थाओं को आतंकवादी संगठन घोषित करना ईरान की ओर से दिया गया एक बेहद सख्त राजनीतिक संदेश है।
ईरान के विदेश मंत्रालय ने ब्रिटिश सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि इस फैसले के संभावित परिणामों की जिम्मेदारी लंदन को उठानी होगी। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि ईरान की ओर से किसी विदेशी सैन्य संस्था को आतंकवादी संगठन घोषित करने से उसकी कानूनी स्थिति पूरी दुनिया में अपने आप नहीं बदल जाती। इसका प्रभाव मुख्य रूप से ईरान के घरेलू कानूनों और उसके अधिकार क्षेत्र तक सीमित रहेगा। ब्रिटेन की संस्थाओं की स्थिति ब्रिटिश कानून के तहत पहले की तरह बनी रहेगी।
फिलहाल इस फैसले पर ब्रिटेन की आगे की प्रतिक्रिया और दोनों देशों के बीच होने वाली संभावित कूटनीतिक गतिविधियां महत्वपूर्ण होंगी। यदि ब्रिटेन भी जवाबी कदम उठाता है, तो दोनों देशों के संबंधों में तनाव और गहरा सकता है। पहले से ही अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी टकराव ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को संवेदनशील बना रखा है। ऐसे में ब्रिटेन को लेकर ईरान का यह नया फैसला पश्चिमी देशों और मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह कार्रवाई केवल राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव तक सीमित रहेगी या आने वाले दिनों में ईरान और ब्रिटेन के बीच टकराव का एक नया मोर्चा भी खुल सकता है?


