BRICS सम्मेलन से पहले भारत को लेकर यूरोप से आया एक बड़ा कूटनीतिक बयान इस समय चर्चा में है। लग्जमबर्ग के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री जेवियर बेटेल ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि अगर दुनिया को अधिक प्रतिनिधित्व और न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की ओर बढ़ना है, तो भारत जैसे बड़े और प्रभावशाली देश को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिलनी चाहिए।
जेवियर बेटेल तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे पर भारत पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने नई दिल्ली में भारतीय नेतृत्व के साथ उच्च स्तरीय बातचीत की। उनकी यात्रा का उद्देश्य भारत और लग्जमबर्ग के बीच द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करना था। इसके अलावा उन्होंने चेन्नई में आईआईटी मद्रास से जुड़े एक कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया। लेकिन उनकी यात्रा के दौरान दिया गया UNSC से जुड़ा बयान सबसे ज्यादा सुर्खियों में आ गया।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। वर्तमान में UNSC के पांच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन। इन पांच देशों के पास वीटो पावर भी है। वहीं भारत सहित कई देश सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में सुधार की मांग करते रहे हैं। भारत का तर्क है कि आज की वैश्विक व्यवस्था में दुनिया की आबादी, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए सुरक्षा परिषद का ढांचा ज्यादा प्रतिनिधित्व वाला होना चाहिए।
जेवियर बेटेल का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत की स्थायी सदस्यता को लेकर यूरोपीय देशों के समर्थन की चर्चा लगातार बढ़ रही है। भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक भूमिका लगातार बढ़ी है। ऐसे में भारत के समर्थकों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली संस्था में भारत को स्थायी भूमिका मिलना वैश्विक प्रतिनिधित्व को मजबूत करेगा।
भारत की दावेदारी सिर्फ उसकी आबादी या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। भारत संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में लंबे समय से योगदान देता रहा है। इसके अलावा भारत दुनिया के कई विकासशील देशों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। यही वजह है कि भारत खुद को ग्लोबल साउथ के एक प्रमुख प्रतिनिधि के तौर पर भी पेश करता है।
हालांकि UNSC में स्थायी सदस्यता हासिल करना आसान नहीं है। सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति की जरूरत होती है। मौजूदा स्थायी सदस्यों की भूमिका भी इस प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण है। खास तौर पर वीटो पावर रखने वाले देशों की सहमति के बिना किसी बड़े बदलाव को लागू करना मुश्किल है। यही वजह है कि भारत की स्थायी सदस्यता का मुद्दा लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है।
जेवियर बेटेल के बयान को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है और BRICS जैसे समूहों में भी भारत एक महत्वपूर्ण शक्ति है। भारत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत करता रहा है, जिसमें किसी एक या कुछ चुनिंदा देशों के बजाय अधिक देशों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में भूमिका मिले।
भारत और लग्जमबर्ग के बीच संबंध भी पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक और रणनीतिक क्षेत्रों में आगे बढ़े हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, तकनीक, वित्त और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं हैं। ऐसे में लग्जमबर्ग के विदेश मंत्री का भारत की UNSC स्थायी सदस्यता का समर्थन करना दोनों देशों के बढ़ते कूटनीतिक संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या यूरोप के दूसरे देश भी भारत की स्थायी सदस्यता और वीटो पावर की मांग का खुलकर समर्थन करेंगे। अगर भारत के पक्ष में अंतरराष्ट्रीय समर्थन बढ़ता है, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की बहस को नई गति मिल सकती है। फिलहाल जेवियर बेटेल का बयान भारत की कूटनीतिक स्थिति के लिए एक अहम समर्थन जरूर है और इसने UNSC में भारत की स्थायी सीट की पुरानी मांग को एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।


